असम विधानसभा में इस बार विपक्ष में दिखेंगे केवल मुस्लिम विधायक, चुनाव नतीजों से बना अजीब संयोग

न्यूज डेस्क : 4 मई को आए विधानसभा चुनावों के नतीजों में असम विधानसभा चुनाव के परिणाम बेहद चौंकाने वाले आए हैं।  आने के बाद जो आंकड़े सामने आए है। उसमें से एक बात साफ तौर पर नजर आती है कि, गैर एनडीए दलों के 24 निर्वाचित विधायकों में से 22 मुस्लिम समुदाय से हैं। इसमें से कांग्रेस ने 19 सीटें जीतीं है, जो कि मुस्लिम विधायकों का सबसे बड़ा गुट (18) है। वहीं, एआईयूडीएफ के पास दो सीटें हैं और रायजोर दल और तृणमूल कांग्रेस के पास एक-एक सीट है।

असम में विपक्ष पूरी तरह से मुस्लिम

असम विधानसभा में विपक्ष में अब सिर्फ दो हिंदू चेहरे हैं। इनमें से एक है रायजोर दल के प्रमुख अखिल गोगोई, जिन्होंने सिबसागर सीट बरकरार रखी और दूसरे कांग्रेस के जॉयप्रकाश दास; जिन्होंने नाओबोइचा सीट से जीत हासिल की। जहां मुस्लिम मतदाताओं की अच्छी खासी संख्या है। इसके अलावा कांग्रेस के सभी मौजूदा हिंदू विधायक अपनी सीटें हार गए। एक तरफ असम विधानसभा का यह चुनाव बीजेपी के लिए बोनस साबित हुआ है। वहीं, कांग्रेस ने सिकुड़े हुए मुस्लिम बहुल क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत की है। हालांकि, इसका सीधा नुकसान इत्र कारोबारी बदरुद्दीन अजमल की एआईयूडीएफ पार्टी को भुगतना पड़ा।

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हिमंत बिस्वा सरमा ने जताई आपत्ति

इस नए नंबर गेम को लेकर मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा, “यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि कांग्रेस के एक विधायक को छोड़कर बाकी सभी इस्लाम धर्म का पालन करते हैं। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि हिंदू या मुस्लिम जीते हैं। मैं केवल आंकड़े दे रहा हूं और यह आपका विश्लेषण है।” चुनाव के परिणाम साफ कहते है कि, वहां की जनता ने विपक्ष में करीब-करीब मुसलमानों को हार का मुंह दिखा दिया है। इन आंकड़ों को लेकर मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा शुरू से ही कहते आ रहे थे कि, परिसीमन के बाद स्वदेशी समुदाय ही राज्य में सरकार बनाने का काम करेगी। ऐसा इसीलिए क्योंकि, विधानसभा के कुल 126 सीटों में से 100 से अधिक सीटों पर स्वदेशी समुदाय का बहुलता है।

परिसीमन से बदला सारा खेल

टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2023 में निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं के पुनर्निर्धारण के बाद असम के पहले विधानसभा चुनाव में परिसीमन एक अप्रत्याशित फैक्टर साबित हुआ। परिसीमन के कारण मुस्लिम बहुल सीटों की संख्या 35 से घटकर 22 हो गई, जिससे बीजेपी के दो मुख्य प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस और एआईयूडीएफ अब एक दूसरे के खिलाफ अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। हालांकि विधानसभा सीटों की संख्या 126 ही रही। उसमें कोई बदलाव नहीं आया। मगर, परिसीमन ने प्रतिनिधित्व के समीकरण को बदल दिया, जिससे मुस्लिम विधायकों की संख्या 25 से कम रही, जबकि स्वदेशी समुदाय 90 सीटों के मुकाबले 103 सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाने लगे।

कई विधायकों ने बदला पाला

राज्य की नई चुनावी भौगोलिक स्थिति ने चुनाव से पहले ही विपक्ष के संतुलन को बिगाड़ दिया था। कई मौजूदा AIUDF विधायकों ने पाला बदलकर NDA की घटक पार्टी AGP का हाथ थाम लिया था। BJP के लिए यह एक रणनीतिक कदम था, जिससे उन सीटों पर NDA की संभावनाएं बढ़ गईं जहां मुस्लिम वोटर्स निर्णायक भूमिका निभाते हैं। हालांकि, सब कुछ योजना के मुताबिक नहीं हुआ, लेकिन AIUDF को सिर्फ दो सीटें मिलना BJP की चाहत के मुताबिक ही था।

असम में मुस्लिम विधायकों की सूची

कांग्रेस

एमडी अशरफुल इस्लाम शेख (परबतझोरा), अब्दुस सोबहान अली सरकार (गौरीपुर), बेबी बेगम (धुबरी), वाजेद अली चौधरी (बिरसिंग जारुआ), मोहिबुर रोहमन बप्पी (मनकचर), आफताब उद्दीन मोल्ला (जलेश्वर), अबुल कलाम रशीद आलम (गोलपाड़ा पूर्व), एम.डी. नुरुल इस्लाम (श्रीजंगराम), अब्दुर रहीम अहमद (चेंगा), जाकिर हुसैन सिकदर (पाकाबेटबारी), रेकीबुद्दीन अहमद (चमरिया), डॉ आसिफ मोहम्मद नज़र (लहरीघाट), नुरुल हुदा (रुपाहीहाट), तंजील हुसैन (सामागुरी), अमीनुल हक लस्कर (सोनाई), जुबैर अनम मजूमदे (अल्गापुर-कतलीचेरा), जकारिया अहमद (करीमगंज उत्तर), अमिनुर रशीद चौधरी (करीमगंज दक्षिण)

ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (AIUDF)

मजीबुर रहमान (दलगांव), मोहम्मद बदरुद्दीन अजमल (बिन्नाकांडी)

रायजर दल (आरजेआरडी)

मेहबूब मुक्तार (धींग)

अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी)

शर्मन अली अहमद (मंडिया)

अप्रवासन के प्रभाव कम

असम की राजनीति लंबे समय से बांग्लादेश से अवैध अप्रवासन से प्रभावित रही है। एक जनआंदोलन के बाद 1985 का असम समझौते ने नागरिकता के लिए 25 मार्च, 1971 की तिथि निर्धारित की थी। लेकिन इसके बाद भी अवैध अप्रवासन जारी रहने के आरोप लगते रहे हैं। भाजपा लगातार यह तर्क देती रही है कि राज्य की राजनीतिक दिशा प्रवासी मुस्लिम आबादी के बजाय स्वदेशी समुदायों द्वारा निर्धारित की जानी चाहिए।

असम में अल्पसंख्यकों के वोटिंग पैटर्न ऐतिहासिक रूप से सत्ताधारी पार्टी के पक्ष में रहे हैं, जब तक कि भाजपा ने 2016 में अपना पहला मंत्रिमंडल नहीं बनाया। परिसीमन के बाद यह स्थिति और भी बदल गई है। बाकी मुस्लिम बहुल सीटों के मतदाता भाजपा के शासन में अपने हितों की सुरक्षा को लेकर चिंताओं के बीच कांग्रेस का समर्थन कर रहे हैं।

एयर नाउ स्पेशल

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