रांची: “क्या राज्य के मुख्यमंत्री अप्रासंगिक हो गए हैं? क्या झारखंड में लोकतांत्रिक व्यवस्थाएँ ध्वस्त हो गई हैं? क्या सरकार का राजनीतिक नेतृत्व विफल हो गया है? क्या मुख्यमंत्री द्वारा की गई शासकीय गलतियों एवं लिए गए निर्णयों को लेकर राज्य के कुछ वर्तमान एवं पूर्व वरीय नौकरशाह उन्हें ब्लैकमेल कर रहे हैं?
क्या शासन पर मुख्यमंत्री की पकड़ बहुत कमजोर हो गई है? लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत स्थापित परंपराओं, मर्यादाओं एवं नयाचारों से विचलन से जुड़ी कुछ हालिया घटनाओं के कारण आम लोगों के मन में ऐसे ही प्रश्न जन्म ले रहे हैं।” इन सवालों को उठाय़ा है राज्य के पूर्व उपमुख्यमंत्री व आजसू पार्टी के मुखिया सुदेश महतो ने, उन्होंने शनिवार को एक्स हैंडल पर लिखे पोस्ट में ये सवाल उठाये हैं.
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अपने पोस्ट में उन्होंने आगे लिखा, “विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता बाबूलाल मरांडी एवं भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू को माननीय मुख्यमंत्री से समय नहीं मिलने के कारण अपनी मांगों से संबंधित ज्ञापन राज्य के मुख्य सचिव को सौंपना पड़ता है। मुख्य सचिव, नेता प्रतिपक्ष के नेतृत्व में आए प्रतिनिधिमंडल से माननीय मुख्यमंत्री के कॉन्फ्रेंस हॉल में ही ज्ञापन प्राप्त करते हैं। अपुष्ट सूत्रों ने यह भी बताया है कि प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात के दौरान मुख्य सचिव कॉन्फ्रेंस हॉल में सामान्यतः माननीय मुख्यमंत्री के लिए चिह्नित कुर्सी पर ही बैठे।”
“बात यहीं नहीं रुकती। सरकार में शामिल दलों कांग्रेस एवं झामुमो के लिए भी मुख्यमंत्री उपलब्ध नहीं हैं। कांग्रेस एवं झामुमो के प्रतिनिधिमंडल भी अपनी कतिपय मांगों से संबंधित ज्ञापन मुख्य सचिव को ही सौंपते हैं। जिस मुख्य सचिव को JPSC-JSSC घोटाले से संबंधित मांगों पर कार्रवाई के लिए ज्ञापन सौंपे गए हैं, उनके ही गोपनीय कार्यालय से एक सरकारी कर्मी को CID ने गिरफ्तार किया है, जो इन घोटालों के मुख्य आरोपियों में से एक है।”
इस कर्मी ने क्या-क्या खुलासे किए हैं, राज्य की जनता CID से यह जानना चाहती है। व्यवस्था में व्याप्त यह अव्यवस्था क्या किसी त्रासदी से कम है? आखिर राज्य के माननीय मुख्यमंत्री अपने राजनीतिक सहयोगियों, विपक्षी दल के प्रतिनिधियों एवं सरकार में शामिल राजनीतिक दलों के प्रतिनिधिमंडलों से मिलने में क्यों असहज महसूस कर रहे हैं? नेता प्रतिपक्ष तक को मुख्यमंत्री से मिलने का समय नहीं दिया जाना तथा उन्हें अपने विधायकों के साथ मुख्य सचिव को ज्ञापन सौंपने के लिए बाध्य होना आखिर किस ओर संकेत करते हैं? राज्य की जनता, राजनीतिक विश्लेषक एवं शासन संचालन के जानकार—सभी इस पूरे घटनाक्रम से हैरान हैं।

