लोग फिल्म देखने जाते हैं तो कहानी याद रखते हैं, हीरो याद रखते हैं, कभी-कभी कोई डायलॉग भी याद रह जाता है. लेकिन कुछ निर्देशक ऐसे होते हैं, जिनकी फिल्मों में कहानी से पहले उनका स्टाइल दिखाई देने लगता है. हीरो की चमकदार जैकेट, हाथ में महंगी घड़ी, पीछे बजता तेज संगीत, कैमरे का स्लो मोशन और गोलियों की आवाज. पर्दे पर ये सब दिखे तो समझिए कि फिल्म Sanjay Gupta की है.
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लेकिन संजय गुप्ता की कहानी सिर्फ स्टाइल और स्वैग की कहानी नहीं है. एक ऐसा लड़का, जिसने 15 साल की उम्र में फिल्मों के पोस्ट प्रोडक्शन और साउंड डिजाइन का काम शुरू किया. जिसने संजय दत्त के साथ दोस्ती की, साथ में फिल्में बनाईं, फिर ऐसा झगड़ा हुआ कि चार साल तक दोनों ने एक-दूसरे से बात तक नहीं की. और फिर अमिताभ बच्चन की जन्मदिन पार्टी में दोनों मिले तो गले लगकर रो पड़े.
संजय गुप्ता ने ‘आतिश’, ‘कांटे’, ‘मुसाफिर’ और ‘जिंदा’ जैसी फिल्मों से हिंदी सिनेमा में अपनी अलग पहचान बनाई. उन पर हॉलीवुड फिल्मों की नकल करने के आरोप भी लगे. उनकी कई फिल्में नहीं चलीं, लेकिन उनकी सिनेमाई शैली पर बहस हमेशा होती रही. सवाल यह है कि आखिर संजय गुप्ता के सिनेमा में ऐसा क्या था कि उनकी फिल्मों का एक फ्रेम देखकर ही उनका नाम याद आ जाता था? और पर्दे के पीछे कैसी थी उस फिल्मकार की जिंदगी, जो कैमरे पर हर चीज को बड़े अंदाज में दिखाना चाहता था?
15 साल की उम्र से शुरू हो गया था फिल्मों का सफर
Sanjay Gupta का फिल्मों के प्रति जुनून बचपन से था. उन्होंने महज 15 वर्ष की उम्र में पोस्ट-प्रोडक्शन और साउंड डिजाइन का काम शुरू कर दिया था. फिल्म निर्माण के तकनीकी पक्ष को समझने का उन्हें कम उम्र में ही मौका मिल गया था. उन्होंने निर्देशक पंकज पाराशर के साथ टेलीविजन धारावाहिक ‘करमचंद’ और फिल्म ‘जलवा’ में भी काम किया.
यह अनुभव आगे चलकर उनकी फिल्मों में दिखाई दिया. वे सिर्फ पटकथा और कलाकारों पर निर्भर रहने वाले निर्देशक नहीं थे. फिल्म के तकनीकी पक्षों में उनकी गहरी दिलचस्पी थी. कैमरा, ध्वनि, एडिटिंग और संगीत को लेकर उनकी अपनी सोच थी. शायद यही कारण था कि उनकी फिल्मों में दृश्य और ध्वनि का तालमेल खास होता था.
साल 1994 में मशहूर निर्माता जीपी सिप्पी ने 25 वर्षीय संजय गुप्ता को फिल्म ‘आतिश : फील द फायर’ निर्देशित करने का मौका दिया. संजय दत्त, आदित्य पंचोली, रवीना टंडन और करिश्मा कपूर जैसे कलाकारों से सजी यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कोई बड़ी कामयाबी हासिल नहीं कर सकी, लेकिन इसने फिल्म इंडस्ट्री का ध्यान जरूर खींचा.
‘आतिश’ में विदेशी क्राइम फिल्मों का प्रभाव साफ दिखाई देता था. कहानी में दोस्ती, अपराध, बदला और गैंगस्टर दुनिया के बीच उलझे किरदार थे. लेकिन संजय गुप्ता की खासियत यह थी कि उन्होंने इन तत्वों को अपने अंदाज में पेश किया. फिल्म के किरदारों का पहनावा, उनकी बॉडी लैंग्वेज, संवाद बोलने का तरीका और कैमरे की नजर, सबमें एक अलग तरह की स्टाइलिश प्रस्तुति दिखाई देती थी.
संजय दत्त को भी इस फिल्म में एक खास अंदाज में पेश किया गया. उनकी भारी आवाज, मजबूत कद-काठी और पर्दे पर मौजूदगी का पूरा इस्तेमाल किया गया. यह वही दौर था जब संजय दत्त की स्टार इमेज को एक नए तरह के एक्शन और क्राइम सिनेमा से जोड़ने की कोशिश हो रही थी. ‘आतिश’ से संजय दत्त इतने प्रभावित हुए कि संजय गुप्ता से उनकी गहरी दोस्ती हो गई.
विदेशी फिल्मों से प्रभावित कहानियां, लेकिन प्रस्तुति में अपना अंदाज
‘आतिश’ के बाद 1995 में Sanjay Gupta ने जैकी श्रॉफ और मनीषा कोइराला के साथ ‘राम शास्त्र’ बनाई. इस फिल्म में हॉलीवुड की ‘हार्ड टू किल’ का प्रभाव था. 1997 में आई ‘हमेशा’ में उन्होंने रोमांटिक ड्रामा और पुनर्जन्म की कहानी की ओर रुख किया. फिल्म सफल नहीं रही, लेकिन उनके दृश्य संयोजन और प्रस्तुतिकरण की चर्चा हुई.
साल 2000 में उन्होंने ‘जंग’ और ‘खौफ’ जैसी फिल्में बनाईं. ‘जंग’ में जैकी श्रॉफ और संजय दत्त थे, जबकि ‘खौफ’ में संजय दत्त और अजय देवगन नजर आए. इन फिल्मों की कहानी और ट्रीटमेंट में भी हॉलीवुड थ्रिलर का असर था. ‘जंग’ को ‘डेस्परेट मेजर्स’ और ‘खौफ’ को ‘द जूरर’ से प्रेरित बताया जाता है.
संजय गुप्ता विदेशी फिल्मों से प्रभावित होने की बात छिपाते नहीं थे. उनका मानना था कि दुनिया भर के सिनेमा से प्रेरणा लेना गलत नहीं है. एक फिल्मकार को अलग-अलग माध्यमों से सीखना चाहिए. हालांकि, उनके करियर में विदेशी फिल्मों से समानता को लेकर सवाल भी उठे. खासकर ‘कांटे’ को लेकर यह बहस काफी चली.
‘कांटे’: छह किरदार, एक बैंक डकैती और Sanjay Gupta का स्टाइल
साल 2002 में आई ‘कांटे’ Sanjay Gupta के करियर की सबसे चर्चित फिल्मों में से एक बनी. संजय दत्त, अमिताभ बच्चन, सुनील शेट्टी, कुमार गौरव, महेश मांजरेकर और लकी अली जैसे कलाकारों से सजी इस फिल्म में छह ऐसे किरदार थे, जो मिलकर बैंक लूटने की योजना बनाते हैं. लेकिन योजना से ज्यादा दिलचस्प उनके बीच का अविश्वास, टकराव और बदलते समीकरण थे.
‘कांटे’ की तुलना ‘सिटी ऑन फायर’ और ‘रिजर्वायर डॉग्स’ जैसी फिल्मों से हुई. संजय गुप्ता ने इसे किसी एक फिल्म की नकल मानने से इनकार किया था. उनका कहना था कि यह एक क्राइम फिल्म है, जिसकी कहानी और ट्रीटमेंट कई तरह के सिनेमा से प्रभावित हो सकते हैं.
फिल्म की सबसे बड़ी विशेषता उसका विजुअल ट्रीटमेंट था. लॉस एंजिल्स की पृष्ठभूमि, किरदारों का पहनावा, लोकेशन और कैमरे की पोजिशनिंग ने इसे उस समय की आम हिंदी एक्शन फिल्मों से अलग कर दिया. फिल्म में हर किरदार की अपनी स्क्रीन प्रेजेंस थी. अमिताभ बच्चन और संजय दत्त जैसे बड़े सितारों को एक ही फ्रेम में अलग-अलग अंदाज से पेश करना आसान नहीं था, लेकिन Sanjay Gupta ने दोनों को उनकी शख्सियत के अनुरूप जगह दी.
बंद जगहों में तनाव पैदा करने के लिए उन्होंने क्लोजअप और वाइड फ्रेम का अच्छा इस्तेमाल किया. किरदारों के चेहरों पर ठहरता कैमरा, अचानक बदलते दृश्य और एडिटिंग की गति कहानी में बेचैनी पैदा करती थी. एक्शन को भी उन्होंने केवल मारपीट तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे फिल्म के तनाव और कहानी की लय से जोड़ा.
‘कांटे’ बॉक्स ऑफिस पर उम्मीदों के अनुरूप बड़ी सफलता हासिल नहीं कर सकी, लेकिन समय के साथ इसे एक खास पहचान मिली. फिल्मफेयर में सर्वश्रेष्ठ निर्देशक के लिए Sanjay Gupta को नामांकन भी मिला. आज भी स्टाइलिश क्राइम फिल्मों की चर्चा में इसका नाम लिया जाता है.
Sanjay Gupta रंग, कैमरा और संगीत से बनाते थे अपनी अलग दुनिया
Sanjay Gupta की फिल्मों की सबसे बड़ी पहचान उनका दृश्य संसार था. वे खुद भी मानते थे कि हर निर्देशक की एक अलग सिनेमाई लिखावट होनी चाहिए. एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि वे अपनी फिल्मों को वास्तविक दुनिया से कुछ अलग दिखाना चाहते हैं. इसके लिए वे हर फिल्म का अपना कलर पैलेट और स्टाइल तैयार करते थे.
उनके यहां रंगों का इस्तेमाल महज सजावट के लिए नहीं होता था. गहरे और ठंडे रंगों से अपराध की दुनिया का तनाव पैदा करना, तेज रोशनी और कंट्रास्ट के जरिए किरदारों को उभारना तथा लाइटिंग के जरिए किसी जगह का मूड बनाना उनके फिल्मी व्याकरण का हिस्सा था. कलर ग्रेडिंग के माध्यम से वे पूरी फिल्म को एक खास टोन देते थे.
कैमरा लेंस और फ्रेमिंग को लेकर भी उनकी सोच अलग थी. लो-एंगल शॉट से किसी किरदार को प्रभावशाली दिखाना, क्लोजअप से उसके चेहरे पर मौजूद तनाव को पकड़ना और वाइड फ्रेम में किसी किरदार को अकेला दिखाकर उसकी मनःस्थिति जाहिर करना, उनके पसंदीदा सिनेमाई तरीकों में शामिल था.
उनके किरदारों के कपड़े भी खास होते थे. स्टाइलिश जैकेट, चश्मे, महंगी घड़ियां और आकर्षक एसेसरीज उनके हीरो की पहचान बन जाती थीं. अभिनेत्रियों को भी वे बेहद ग्लैमरस अंदाज में पेश करते थे. वे जानते थे कि दर्शक सिर्फ कहानी देखने नहीं आता, बल्कि बड़े पर्दे पर एक आकर्षक सिनेमाई अनुभव भी चाहता है.
साउंड डिजाइन और संगीत के मामले में भी उनकी पसंद अलग थी. गोली चलने की आवाज, अचानक पैदा होने वाला सन्नाटा, एक्शन के दौरान बजता संगीत और फिल्म के मूड के अनुरूप तैयार किया गया साउंडट्रैक उनके लिए बेहद महत्वपूर्ण था. ‘कांटे’ और ‘जिंदा’ के संगीत तथा ध्वनि संयोजन में यह सोच खास तौर पर दिखाई देती है. वे संगीत को फिल्म की कहानी से जोड़कर देखते थे और संगीतकारों के साथ बैठकर फिल्म की परिस्थितियों के मुताबिक धुनों पर काम करना पसंद करते थे.
संजय दत्त से दोस्ती: चार साल की दूरी और फिर अमिताभ बच्चन की पार्टी में सुलह
Sanjay Gupta के जीवन और करियर की चर्चा संजय दत्त के बिना अधूरी है. दोनों के बीच दोस्ती का रिश्ता काफी पुराना था. दिलचस्प बात यह है कि उनकी दोस्ती ‘आतिश’ के सेट पर नहीं, बल्कि राज सिप्पी की फिल्म ‘थानेदार’ के सेट पर शुरू हुई थी. उस समय संजय गुप्ता 22 वर्ष के थे. दोनों के बीच बातचीत बढ़ी और धीरे-धीरे दोस्ती गहरी होती चली गई.
संजय दत्त ने संजय गुप्ता की पहली निर्देशित फिल्म ‘आतिश’ में काम करने का वादा किया और उसे निभाया भी. इसके बाद दोनों की जोड़ी ने कई फिल्मों में साथ काम किया. संजय गुप्ता को संजय दत्त की शख्सियत की खूबियां मालूम थीं. उनके चेहरे के भाव, मजबूत कद-काठी और स्क्रीन पर मौजूदगी को वे अपने निर्देशन में खास तरीके से इस्तेमाल करते थे.
‘आतिश’ से शुरू हुआ यह साथ ‘जंग’, ‘खौफ’, ‘कांटे’, ‘मुसाफिर’ और ‘जिंदा’ तक पहुंचा. दोनों ने साथ में व्हाइट फेदर फिल्म्स नाम की प्रोडक्शन कंपनी भी शुरू की. यह दोस्ती सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं थी. दोनों एक-दूसरे के निजी जीवन का भी हिस्सा थे. Sanjay Gupta ने एक इंटरव्यू में बताया था कि वे संजय दत्त से बहुत प्यार और सम्मान करते थे और एक-दूसरे को कभी हल्के में नहीं लेते थे.
लेकिन इस दोस्ती में एक समय ऐसा भी आया जब दोनों के रास्ते अलग हो गए. ‘शूटआउट एट लोखंडवाला’ के निर्माण के दौरान 2007 में दोनों के बीच विवाद हुआ. उनकी प्रोडक्शन कंपनी से जुड़े वित्तीय मामलों को लेकर भी आरोप-प्रत्यारोप सामने आए. इसके बाद संजय दत्त ने Sanjay Gupta के साथ अपनी व्यक्तिगत और पेशेवर साझेदारी खत्म कर दी.
यह भी कहा जाता है कि संजय दत्त की पत्नी मान्यता को यह दोस्ती पसंद नहीं थी. कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि मान्यता से शादी के बाद संजय दत्त और संजय गुप्ता के रिश्तों में दूरी बढ़ गई और मान्यता ने संजय दत्त से उन्हें अलग कर दिया.
दोनों के बीच करीब चार साल तक बातचीत नहीं हुई. इस दौरान Sanjay Gupta को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा. उन्होंने बाद में बताया था कि फिल्म इंडस्ट्री के कई लोग उनसे दूरी बनाने लगे थे. कुछ लोगों को लगता था कि संजय दत्त ने उनके साथ काम नहीं करने के लिए कहा है, जबकि संजय गुप्ता के मुताबिक संजय दत्त ने ऐसा कभी नहीं कहा था.
इस रिश्ते में फिर से गर्मजोशी तब लौटी जब अमिताभ बच्चन की 70वीं जन्मदिन पार्टी में दोनों का आमना-सामना हुआ. संजय दत्त ने उन्हें आवाज दी. दोनों गले मिले और उनकी आंखों में आंसू आ गए. वर्षों की नाराजगी उस एक मुलाकात में पिघल गई.
हालांकि, सुलह के बाद Sanjay Gupta ने एक दिलचस्प फैसला लिया. उन्होंने कहा कि अब वे दोनों साथ में शराब नहीं पिएंगे और साथ में काम भी नहीं करेंगे. दोस्ती अपनी जगह रहेगी, लेकिन कारोबार और निजी रिश्तों को अलग रखा जाएगा. यह फैसला बताता है कि दोनों के बीच रिश्ते कितने गहरे थे और उनके टूटने से दोनों को कितना दुख पहुंचा था.
‘मुसाफिर’ और ‘जिंदा’ में दिखा स्टाइल का चरम
साल 2004 में आई ‘मुसाफिर’ में Sanjay Gupta ने एक बार फिर अपने पसंदीदा क्राइम और थ्रिलर संसार को सामने रखा. अनिल कपूर, संजय दत्त, आदित्य पंचोली और समीरा रेड्डी अभिनीत इस फिल्म में रंगों, लोकेशन और कैमरा एंगल का खूब इस्तेमाल हुआ. ब्राउन कलर का फिल्म में खूब उपयोग किया गया. कहानी में लगातार बदलते समीकरण और किरदारों की चालबाजियां थीं. फिल्म का विजुअल ट्रीटमेंट उसे सामान्य एक्शन फिल्म से अलग बनाता था.
2006 में आई ‘जिंदा’ को उनके करियर की महत्वपूर्ण फिल्मों में गिना जाता है. यह दक्षिण कोरियाई फिल्म ‘ओल्डबॉय’ से प्रेरित थी. संजय दत्त के किरदार की मानसिक स्थिति, अकेलापन, गुस्सा और बदले की भावना को जिस तरह पेश किया गया, उसमें संजय गुप्ता की तकनीकी दृष्टि दिखाई देती है. ग्रे कलर का उपयोग कर संजय ने किरदारों की मानसिक स्थिति को दिखाने की कोशिश की.
फिल्म के अंधेरे दृश्य, सीमित लोकेशन, क्लोज फ्रेम और तनाव पैदा करने वाला साउंड डिजाइन कहानी के प्रभाव को बढ़ाते हैं. यहां संजय दत्त का अभिनय और संजय गुप्ता का निर्देशन एक-दूसरे के पूरक बन जाते हैं. फिल्म में हिंसा केवल एक्शन का हिस्सा नहीं थी, बल्कि किरदार की मानसिक यातना को व्यक्त करने का माध्यम भी थी.
संजय दत्त से अलगाव के बाद Sanjay Gupta ने बदला करियर का रास्ता
संजय दत्त से दूरी के बाद Sanjay Gupta ने अपना काम जारी रखा. 2007 में ‘शूटआउट एट लोखंडवाला’ का निर्माण हुआ, जिसका निर्देशन अपूर्व लाखिया ने किया था. यह फिल्म मुंबई अंडरवर्ल्ड और पुलिस मुठभेड़ की कहानी के कारण काफी चर्चित हुई. इसी साल उन्होंने ‘दस कहानियां’ का निर्देशन और निर्माण भी किया, जिसमें अलग-अलग कहानियों को एंथोलॉजी के रूप में पेश किया गया.
इसके बाद ‘वुडस्टॉक विला’, ‘एसिड फैक्ट्री’ और ‘पंख’ जैसी फिल्मों से वे जुड़े. इन फिल्मों में उन्होंने अपने प्रोडक्शन हाउस के जरिए अलग-अलग तरह के विषयों को मौका दिया.
2013 में ‘शूटआउट एट वडाला’ के साथ वे एक बार फिर गैंगस्टर सिनेमा की दुनिया में लौटे. 2015 में ऐश्वर्या राय बच्चन अभिनीत ‘जज्बा’ और 2017 में ऋतिक रोशन की ‘काबिल’ का निर्देशन किया. ‘काबिल’ में एक नेत्रहीन व्यक्ति की कहानी को बदले और थ्रिलर के अंदाज में पेश करना उनके लिए अलग तरह का प्रयोग था. 2021 में ‘मुंबई सागा’ के जरिए उन्होंने फिर मुंबई के अंडरवर्ल्ड की दुनिया को बड़े पर्दे पर उतारा.
लेकिन दर्शकों के एक वर्ग को ‘कांटे’, ‘मुसाफिर’ और ‘जिंदा’ वाला Sanjay Gupta ज्यादा याद आता रहा. उनकी बाद की फिल्मों में भी स्टाइल और एक्शन मौजूद था, लेकिन शुरुआती फिल्मों की ताजगी और दृश्यात्मक आक्रामकता का प्रभाव अलग था.
Sanjay Gupta: बेबाकी से अपनी बात रखने वाला फिल्मकार
Sanjay Gupta फिल्मों के अलावा सोशल मीडिया पर भी सक्रिय रहते थे. फिल्म इंडस्ट्री, कलाकारों, फिल्म निर्माण और बदलते सिनेमाई माहौल पर अपनी राय खुलकर रखते थे. उनकी टिप्पणियां कई बार चर्चा का विषय बनती थीं. वे उन फिल्मकारों में नहीं थे जो हर मुद्दे पर चुप रहना पसंद करते हों.
उनकी फिल्मों पर विदेशी सिनेमा से प्रेरणा लेने के आरोप लगे. कुछ कहानियों के मौलिक होने पर सवाल उठे. उनकी सभी फिल्में सफल नहीं रहीं और हर प्रयोग दर्शकों को पसंद भी नहीं आया. लेकिन उनकी एक खासियत से इनकार नहीं किया जा सकता कि उन्होंने हिंदी सिनेमा में अपनी अलग दृश्यात्मक पहचान बनाई.
30 अक्टूबर 2026 को 57 वर्ष की उम्र में उनके निधन की खबर ने फिल्म इंडस्ट्री को चौंका दिया. एक ऐसा फिल्मकार, जो पर्दे पर अपने किरदारों को बड़े अंदाज में पेश करने के लिए जाना जाता था, अचानक दुनिया से विदा हो गया.
Sanjay Gupta की फिल्मोग्राफी में कई सफलताएं हैं और कई असफलताएं भी. उनकी फिल्मों पर बहस हो सकती है, उनकी कहानियों और प्रेरणा के स्रोतों पर सवाल उठ सकते हैं, लेकिन उनकी सिनेमाई शैली को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. वे उन निर्देशकों में थे जिनकी फिल्म का एक फ्रेम भी उनकी पहचान बता सकता था.
संजय गुप्ता पर हमेशा यह आरोप लगा कि वे मौलिक फिल्मकार नहीं हैं. साथ ही वे बहुत बड़ी हिट फिल्म कभी नहीं दे पाए, लेकिन उनकी फिल्मों में कैमरा भी बोलता था, रंग भी और किरदारों का स्वैग भी. यही उनकी सिनेमाई विरासत है.

