राँची: झारखंड हाईकोर्ट ने भारतीय वायु सेना (IAF) में कार्यरत एक स्क्वाड्रन लीडर को अग्रिम जमानत देते हुए एक बड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने इस मामले को ‘असाधारण’ करार देते हुए कहा कि जो अधिकारी देश की रक्षा में तैनात है, उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रशासनिक प्रक्रियाओं के नाम पर खतरे में नहीं डाला जा सकता।
Highlights:
क्या है पूरा मामला?
भारतीय वायु सेना के एक सेवारत स्क्वाड्रन लीडर पर उनकी पत्नी ने दहेज उत्पीड़न और क्रूरता (498A) का आरोप लगाते हुए मामला दर्ज कराया था। अधिकारी ने कोर्ट को बताया कि वह अपनी पत्नी के साथ फिर से घर बसाना चाहता था, लेकिन उसकी पत्नी उसके साथ रहने को तैयार नहीं थी।
हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी
मामले की सुनवाई जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की एकल पीठ में हुई। सुनवाई के दौरान अदालत ने पुलिस और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता लगातार जांच में सहयोग कर रहा था और फरार नहीं था। इसके बावजूद पुलिस ने उसके खिलाफ ‘इश्तेहार’ (Section 82 CrPC) जारी करने की प्रक्रिया शुरू कर दी। जस्टिस द्विवेदी ने कहा कि यह एक अजीब स्थिति है जहां एक अधिकारी जो देश की सेवा कर रहा है, उसकी आजादी दांव पर लगी है। जांच अधिकारी (I.O.) उसकी गिरफ्तारी के लिए उसकी पोस्टिंग वाली जगह तक पहुंच गए थे, जो कि अनावश्यक था।
ये भी पढ़ें: JSSC-CGL मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट के आदेश को दी गई चुनौती
परिवार को पहले मिली थी राहत
इस मामले में आरोपी बनाए गए स्क्वाड्रन लीडर के परिवार के अन्य सदस्यों को पहले ही अग्रिम जमानत मिल चुकी थी। हालांकि, याचिकाकर्ता के खिलाफ गैर-जमानती वारंट (NBW) जारी किया गया था। जिला एवं सत्र न्यायालय से राहत न मिलने के बाद उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहां उनकी दलीलों को स्वीकार कर लिया गया।
अदालत का महत्वपूर्ण फैसला
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की अग्रिम जमानत अर्जी मंजूर करते हुए स्पष्ट किया कि जब आरोपी जांच में सहयोग कर रहा हो और उसके भागने की कोई संभावना न हो, तो गिरफ्तारी जैसी सख्त प्रक्रिया से बचना चाहिए, विशेषकर तब जब मामला वैवाहिक विवाद से जुड़ा हो।
यह आदेश उन मामलों में एक नजीर की तरह है जहां वैवाहिक विवादों में धारा 498A का उपयोग हथियार के रूप में किया जाता है। कोर्ट ने साफ कर दिया कि वर्दी में देश की सेवा करने वाले अधिकारियों के मान-सम्मान और उनकी स्वतंत्रता की रक्षा करना कानून का दायित्व है।


