Thursday, October 29, 2026

27 साल बाद मिला न्याय: झारखंड हाई कोर्ट ने डायन-बिसाही हत्या मामले में आरोपी को उम्रकैद से किया बरी

रांची: “जब तक अपराध संदेह से परे साबित न हो जाए, तब तक किसी भी नागरिक को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।” आपराधिक न्यायशास्त्र के इसी बुनियादी सिद्धांत को दोहराते हुए झारखंड उच्च न्यायालय ने करीब तीन दशक पुराने अंधविश्वास और डायन-बिसाही के नाम पर हुई एक महिला की हत्या के मामले में निचली अदालत द्वारा आरोपी को सुनाई गई आजीवन कारावास ( उम्रकैद ) की सजा को पूरी तरह खारिज करते हुए उसे बरी कर दिया है।

जस्टिस एस.एन. प्रसाद और जस्टिस पी.के. श्रीवास्तव की खंडपीठ ने अपीलकर्ता मनसू मांझी उर्फ मांसा मांझी की दोषसिद्धि को निरस्त करते हुए उसे तत्काल रिहा करने का आदेश दिया। इस फैसले ने एक बार फिर साबित किया है कि कानून केवल आरोपों पर नहीं, बल्कि पुख्ता सबूतों पर काम करता है।

30 साल पुराना मामला: क्या हुआ था उस वक्त?

यह संवेदनशील मामला साल 1996 का है, जब बोकारो जिले के बालीडीह थाना क्षेत्र के वंशिमली गांव में 2 सितंबर 1996 को चांदमनी मांझियान नामक महिला की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। मृतका पर गांव के ही कुछ लोग डायन होने का शक करते थे। वारदात से एक रात पहले भी इस अंधविश्वास को लेकर गांव में एक पंचायत बुलाई गई थी।
जिसके बाद मृतका के बेटे रूपलाल मांझी ने आरोप लगाया था कि मनसू मांझी और रघुनाथ मांझी ने उसकी मां पर कुल्हाड़ी और लाठी से जानलेवा हमला किया, जिससे उनकी मौत हो गई।

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निचली अदालत ने 1999 में दी थी उम्रकैद

इस मामले में साल 1999 में बोकारो की निचली अदालत ने मनसू मांझी को हत्या का दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। हालांकि, तब दूसरे आरोपी रघुनाथ मांझी को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया था। मनसू मांझी ने इस फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील दायर की थी, जिस पर अब जाकर फैसला आया है।

हाई कोर्ट में कैसे ढह गया अभियोजन पक्ष का केस?

हाई कोर्ट ने जब इस मामले की बारीकी से समीक्षा की, तो पुलिस और अभियोजन पक्ष की कहानी ताश के पत्तों की तरह बिखर गई। अदालत ने गवाहों के बयानों में दो बेहद गंभीर विरोधाभास पाए।

दरअसल केस में मृतका के बेटे रूपलाल मांझी को इकलौता प्रत्यक्षदर्शी ( गवाह ) बनाया गया था। उसने कोर्ट में दावा किया कि उसने अपनी आंखों से मां पर हमला होते देखा था। लेकिन उसकी अपनी पत्नी बसंती देवी के बयान ने इस दावे की हवा निकाल दी। बसंती देवी ने गवाही दी कि उन्होंने सिर्फ गांव में हल्ला सुना था कि सास की हत्या हो गई है, जिसके बाद वह अपने पति ( रूपलाल ) के साथ घटनास्थल पर पहुंची थीं। यानी बेटा मौके पर मौजूद ही नहीं था।

वहीं हथियार को लेकर भी सूचक ने कोर्ट में अपनी कहानी बदल दी। पुलिस को दिए शुरुआती बयान में उसने कहा था कि मां पर कुल्हाड़ी से हमला किया गया, लेकिन ट्रायल के दौरान उसने अदालत में कह दिया कि हमला तलवार से हुआ था। कोर्ट ने माना कि इतना बड़ा विरोधाभास केस को पूरी तरह संदिग्ध बनाता है।

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HC ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया हवाला

सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि “किसी एकल गवाह के बयान पर भी सजा दी जा सकती है, बशर्ते उसकी गवाही पूरी तरह विश्वसनीय और अकाट्य हो। लेकिन जहां केस में दो दृष्टिकोण सामने आ रहे हों- एक जो आरोपी को दोषी बताए और दूसरा जो उसे निर्दोष साबित करे, तो अदालत को हमेशा आरोपी के पक्ष वाले यानी संदेह के लाभ के सिद्धांत को अपनाना चाहिए।”

अदालत ने अपने इस फैसले में देश की सर्वोच्च अदालत के दो बेहद महत्वपूर्ण नजीरों का भी हवाला दिया। जिनमें बिपिन कुमार मंडल बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (2010) और शीलम रमेश बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (1999) शामिल हैं।

साथ ही हाई कोर्ट की खंडपीठ ने निष्कर्ष निकाला कि गवाहों के बयानों में मौजूद भारी विरोधाभासों के कारण आरोपी को दोषी बनाए रखना न्यायसंगत नहीं है। इसी के साथ अदालत ने बोकारो कोर्ट के 27 साल पुराने आदेश को रद्द करते हुए मनसू मांझी को बाइज्जत बरी कर दिया।

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