अमेरिका : अमेरिका और ईरान के रिश्ते लंबे समय से तनावपूर्ण रहे हैं, लेकिन 2025 के अंत और 2026 की शुरुआत में हालात ज्यादा गंभीर हो गए। ईरान ने अपने एयरस्पेस पर सख्ती बढ़ाई, कई अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के रूट बदले गए और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ के आसपास सैन्य गतिविधियां तेज हो गईं। होर्मुज़ वह समुद्री रास्ता है जहां से दुनिया के तेल सप्लाई का बड़ा हिस्सा गुजरता है। यहां जरा सी सैन्य झड़प भी वैश्विक तेल कीमतों और अर्थव्यवस्था को हिला सकती है। अमेरिका ने एहतियातन अपने कुछ सैन्य ठिकानों से कर्मचारियों को हटा दिया है। यह संकेत है कि वॉशिंगटन किसी बड़े टकराव की आशंका को गंभीरता से ले रहा है। वहीं ईरान ने चेतावनी दी कि अगर उस पर हमला हुआ, तो जवाब क्षेत्र भर में फैले अमेरिकी ठिकानों पर होगा। यानी संघर्ष एक देश तक सीमित नहीं रहेगा।
Highlights:
ईरान के भीतर की बेचैनी और बाहरी आक्रामकता
ईरान की सख्ती के पीछे उसके घरेलू हालात भी अहम हैं। महंगाई, बेरोज़गारी और सरकार-विरोधी प्रदर्शन बढ़ते जा रहे हैं। इतिहास बताता है कि जब किसी देश के भीतर दबाव बढ़ता है, तो सत्ता अक्सर बाहरी दुश्मन की ओर ध्यान मोड़ती है। विश्लेषकों के अनुसार, ईरान की आक्रामक भाषा और सैन्य संकेत इसी रणनीति का हिस्सा हो सकते हैं।
ग्रीनलैंड पर विवाद: बर्फ के नीचे छिपी रणनीति
दुनिया के लिए यह हैरानी की बात रही कि अमेरिका को बर्फ से ढके, कम आबादी वाले ग्रीनलैंड में इतनी दिलचस्पी क्यों है। वजह साफ है, रणनीति। ग्रीनलैंड नाटो क्षेत्र में अहम स्थिति में है और आर्कटिक पर निगरानी के लिए निर्णायक ठिकाना है। यहां मौजूद दुर्लभ खनिज भविष्य की टेक्नोलॉजी और हथियार प्रणालियों के लिए बेहद जरूरी हैं। अमेरिका पहले भी ग्रीनलैंड खरीदने की बात कर चुका है, लेकिन अब मामला रणनीतिक दबाव का बन गया है। डेनमार्क और ग्रीनलैंड दोनों ने स्पष्ट किया है कि यह क्षेत्र बिकाऊ नहीं है और सुरक्षा नाटो के जरिए सुनिश्चित होगी।
यूरोप में बढ़ता अविश्वास
ग्रीनलैंड मुद्दे ने यूरोप के भीतर भी तनाव बढ़ाया। डेनमार्क ने किसी भी तरह की जबरदस्ती को अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया और अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाई। पोलैंड ने अमेरिका से सीधे सवाल किया कि क्या ग्रीनलैंड पर दिए गए बयान उसकी आधिकारिक नीति हैं। फ्रांस और जर्मनी जैसे देशों ने डेनमार्क का समर्थन किया। यह साफ संकेत है कि आज दुनिया में सिर्फ दुश्मनों के बीच नहीं, दोस्तों के बीच भी भरोसा कमजोर पड़ रहा है।
मिडिल ईस्ट: इज़राइल केंद्र में
मिडिल ईस्ट में इज़राइल सबसे संवेदनशील कड़ी है। इज़राइल का मानना है कि उसे चारों ओर से खतरा है, इसलिए वह पहले वार की नीति अपनाता है। हाल के महीनों में उसके सैन्य अभियानों में तेजी आई है, खासकर उन समूहों के खिलाफ जिन्हें वह ईरान समर्थित मानता है। इसका नतीजा यह हुआ है कि गाज़ा, वेस्ट बैंक और लेबनान जैसे क्षेत्रों में तनाव चरम पर है। अगर ईरान और इज़राइल सीधे टकराते हैं, तो अमेरिका का इसमें खिंचना लगभग तय माना जा रहा है और तब यह संघर्ष क्षेत्रीय नहीं रहेगा।
चीन-ताइवान: जमीन नहीं, तकनीक की लड़ाई
चीन और ताइवान का विवाद केवल भू-राजनीति का नहीं है। ताइवान आज दुनिया का सबसे बड़ा सेमीकंडक्टर हब है। मोबाइल फोन से लेकर मिसाइल सिस्टम, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से लेकर सैटेलाइट सब कुछ इन चिप्स पर निर्भर है।
चीन जानता है कि अगर वह इस तकनीकी दौड़ में पीछे रह गया, तो अमेरिका से मुकाबला मुश्किल होगा। इसलिए ताइवान उसके लिए तकनीकी और आर्थिक प्रभुत्व का सवाल है। अगर चीन सैन्य कदम उठाता है, तो अमेरिका और उसके सहयोगी प्रतिक्रिया देंगे और यही टकराव को वैश्विक बना सकता है।
भारत की शांत लेकिन अहम रणनीति
इन सबके बीच भारत एक अलग रास्ता चुनता दिख रहा है। भारत बिना ज्यादा शोर किए अपने व्यापारिक ढांचे में बड़ा बदलाव कर रहा है। कई देशों के साथ 70–80% तक व्यापार रुपये में। इसका सीधा मतलब है डॉलर पर निर्भरता कम करना। विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले समय में युद्ध सिर्फ हथियारों से नहीं, बल्कि मुद्रा और आर्थिक दबाव से भी लड़े जाएंगे। भारत का यह कदम बताता है कि वह भविष्य के जोखिमों को समझते हुए तैयारी कर रहा है।


