रांची : झारखंड हाईकोर्ट ने रिम्स की 1964-65 में अधिग्रहीत जमीन पर अवैध निर्माण और अतिक्रमण के मामले में जिला प्रशासन, राजस्व अधिकारियों, रांची नगर निगम और रेरा समेत कई विभागों पर कड़ी फटकार लगाई है। हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस तरलोक सिंह चौहान और जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद की खंडपीठ ने अधिकारियों की लापरवाही पर हैरानी जताते हुए एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) से जांच कराने और दोषी अधिकारियों-बिल्डरों से प्रभावित निवासियों को मुआवजा वसूलने का आदेश दिया है।
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कोर्ट ने नोट किया कि रिम्स की 7 एकड़ जमीन पर अवैध निर्माण कैसे हो गए, जबकि जमीन का अधिग्रहण दशकों पुराना है। सर्किल ऑफिसर ने राजस्व रिकॉर्ड में हेराफेरी कर बाद के खरीदारों के नाम दर्ज किए, किराया रसीदें जारी कीं, नॉन-एंकम्ब्रेंस सर्टिफिकेट दिए, रांची नगर निगम ने बिल्डिंग प्लान पास किए और रेरा ने मल्टीस्टोरी भवनों को मंजूरी दी। बैंक भी लोन देते समय सतर्कता नहीं बरते। कोर्ट ने कहा कि इन लापरवाहियों से निर्दोष निवासियों को नुकसान हुआ, जिनकी इमारतें ध्वस्त हो रही हैं।खंडपीठ ने रिम्स प्रबंधन को भी बराबर जिम्मेदार ठहराया, क्योंकि 2018 से लंबित इस जनहित याचिका में कभी अतिक्रमण की जानकारी नहीं दी गई।
झारखंड लीगल सर्विस अथॉरिटी यानी झालसा के सदस्य सचिव ने 3 दिसंबर 2025 के आदेश पर जांच कर 7 एकड़ अतिक्रमण का खुलासा किया। कोर्ट ने 2011 के जनहित याचिका (हर नारायण लखोटिया बनाम झारखंड राज्य) का हवाला देते हुए रांची नगर निगम की भूमिका पर सवाल उठाए, जहां सीबीआई ने अवैध नक्शा स्वीकृति की जांच की थी। फिलहाल सीबीआई के बजाय राज्य पुलिस के एंटी करप्शन ब्यूरो ( ACB) को प्राथमिकी दर्ज कर जांच का निर्देश दिया।
कोर्ट का निर्देश
कोर्ट ने निर्देश दिया है कि दोषी अधिकारियों (राजस्व, पंजीकरण, नगर निगम, रेरा (RERA) के खिलाफ विभागीय जांच और एसीबी द्वारा प्राथमिकी दर्ज की जाए।बैंकों को अपने कर्मचारियों की लापरवाही की जांच करने का आदेश कोर्ट ने दिया है। इसके अलावा प्रभावित निवासियों को मुआवजा, इसका खर्च दोषी अधिकारियों और बिल्डरों से वसूली करने का भी निर्देश दिया है।कोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि अधिकारी सतर्क रहते तो ऐसा घोटाला न होता। खरीदारों को भी दस्तावेज सत्यापित करने की सलाह दी, लेकिन उनकी निर्दोषता मानते हुए राहत दी। अगली सुनवाई 6 जनवरी 2026 को होगी।


