चाईबासा : यह हैं झारखंड के स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी, एक डॉक्टर हैं और पिछले लगभग 11 महीने से झारखंड में स्वास्थ्य विभाग में मंत्री का पद संभाल रहे हैं, आज माननीय मंत्री महोदय चाईबासा पहुंचे हैं, आप तस्वीर में देख रहे हैं, फूल मालाओं से लदे और मीडिया वालों से घिरे हैं, मंत्रीजी पहुंचे हैं एक मामले की जांच करने, मामला वह जिसने कुछ दिनों पहले न सिर्फ झारखंड को झकझोड़ा बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी सुर्खियां बटोरी, जिसमें कैसे थैलीसीमिया से पीड़ित पांच बच्चों को HIV संक्रमित खून चढ़ा दिया गया. मामले का खुलासा हुआ तो पहले स्वास्थ्य विभाग की टीम पहुंची जांच करने, फिर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने सिविल सर्जन समेत कुछ अधिकारियों को निलंबित कर दिया, पीड़ित परिजनों के लिए दो-दो लाख रूपये मुआवजा का ऐलान हुआ और अब मंत्रीजी पहुंचे हैं मामले की जांच करने, पीड़ितों से मिलने ताकि उनका हालचाल जान सकें.
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लेकिन उसके पहले ही आई इस तस्वीर ने माननीय मंत्रीजी की संवदेना का सच सामने ला दिया. जो परिवार अब बच्चे की पूरी जिंदगी को लेकर अभिशप्त होगा कि न जाने कब तक उनकी सांस रहेगी, उसका हालचाल जानने मंत्री जी फूल मालाओं से अपना स्वागत करवा रहे हैं और मीडिया के लिए तस्वीरें खिंचवा रहे हैं, मीडिया कभी यह नहीं पूछ पाएगा कि आपकी नाक के नीचे कैसे 19 सदर अस्पतालों में संचालित ब्लड बैंक के पास लाइसेंस नहीं है, महज चालान के भरोसे कैसे वह वर्षों से चल रहे हैं. राज्य के 82 में से 45 ब्लड बैंक के पास कई सालों से लाइसेंस नहीं है. झारखंड में जिम्मेदारी तय नहीं होती, मामले से पल्ला झाड़ लिया जाता है मुआवजा का ऐलान करके, सिविल सर्जन को निलंबित करके लेकिन झारकंड हाईकोर्ट इस मामले में चुप नहीं है. गुरूवार को इस मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों से पूछा कि राज्य में बिना लाइसेंस के कैसे ब्लड बैंकों का संचालन हो रहा है.

हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेकर राज्य सरकार से मांगा जवाब
झारखंड हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान मौजूद स्वास्थ्य सचिव अजय कुमार सिंह, झारखंड एड्स कंट्रोल सोसाइटी के प्रोजेक्ट डायरेक्टर, ड्रग कंट्रोलर को हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस तरलोक सिंह चौहान व जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने तत्काल ऐसी घटनाओं को बेहद गंभीर बताते हुए इसे रोकने के लिए एक्शन लेने को कहा. कोर्ट ने कहा कि एचआइवी संक्रमित संक्रमण की एडवांस मशीन न्यूक्लिक एसिड टेस्ट अब तक अस्पतालों में क्यों उपलब्ध नहीं कराई गई है. झारखंड में बिना लाइसेंस के ब्लड बैंक क्यों चल रहे हैं? ब्लड बैंकों के लाइसेंस का रिन्यूअल दो सालों से क्यों लंबित रह रहा है. राज्य के अस्पतालों में पैसे लेकर ब्लड डोनेट का मामला अभी भी देखने में आता है, इस पर अंकुश क्यों नहीं लगता है.
दरअसल यह मामला सामने आया कैसे, चलिए हम आपको विस्तार से बताते हैं. थैलेसीमिया से पीड़ित एक बच्चे को पिछले दिनों रांची सदर अस्पताल में ब्लड चढ़ाया गया था. उसके बाद हुई जांच में बच्चे को एचआइवी संक्रमित पाया गया. बच्चे के पिता ने झारखंड हाइकोर्ट के चीफ जस्टिस को पत्र लिखकर न्याय की मांग की. हाइकोर्ट ने पत्र को गंभीरता से लेते हुए उसे जनहित याचिका में तब्दील कर दिया है.
वहीं इस बीच चाईबासा सदर अस्पताल में भी ब्लड ट्रांसफ्यूजन के बाद पांच बच्चे के HIV-पॉजिटिव पाए जाने का मामला सामने आया और मामले ने मीडिया की खूब सुर्खियां बटोरी. इसमें एक सात वर्षीय बच्चा भी थैलेसीमिया से पीड़ित है. झारखंड हाईकोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए राज्य के स्वास्थ्य सचिव और जिले के सिविल सर्जन से रिपोर्ट मांगी थी. चाईबासा या उससे पहले हुई रांची की घटना सिर्फ एक अस्पताल की गलती नहीं, बल्कि राज्य के स्वास्थ्य व्यवस्था में छुपी बड़ी खामियां उजागर करती है। किसी भी बच्चे या व्यक्ति की जान बेहद कीमती होती है, लेकिन इन घटनाओं ने लोगों को हैरान कर दिया कि कैसे जिन ब्लड बैंकों पर भरोसा कर आप या हम सभी अपने व अपने परिजनों के लिए जरूरत पड़ने पर ब्लड लेते हैं, उनके पास इसके संचालन के लिए लाइसेंस ही नहीं है, यह देखने वाला ही कोई नहीं है कि वह तय मानकों का पालन करते हैं या नहीं, जैसा चाईबासा की घटना में हुआ। इस मामले में स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी जी का बयान भी सामने आया था कि इसके लिए पहले की सरकार दोषी हैं, उन्हें इस मामले पर ध्यान देना चाहिए था, लेकिन उन्होंने नहीं दिया। अब हमारी सरकार इस मामले की जांच पूरी पारदर्शी तरीके से कर रही है।
मामले की जांच के लिए स्वास्थ्य विभाग की विशेष टीम ने जब चाईबासा के सदर अस्पताल में मौजूद ब्लड बैंक का निरीक्षण किया तो उन्हें पता चला कि बच्चों को दिया गया खून सही तरीके से रिकॉर्ड नहीं किया गया था। यानी यह जानना मुश्किल था कि किस बच्चे को कौन सा खून दिया गया और वह खून किन जांचों से गुजरा। टीम ने ब्लड ट्रांसफ्यूजन का पूरा हिस्ट्री रिकॉर्ड देखा। डॉक्टरों तथा तकनीशियनों से पूछताछ की, ब्लड बैंक में मौजूद उपकरण और संसाधनों की भी जांच की। जांच के दौरान सबसे यह खुलासा हुआ कि अस्पताल में खून देने का रिकॉर्ड तो था, लेकिन यह पता करना मुश्किल था कि कौन सा खून सही तरीके से जांचा गया और कौन सा नहीं। इस जांच टीम की रिपोर्ट के धार पर स्वास्थ्य विभाग क्या कार्रवाई करेगा, यह वह जाने लेकिन इस मामले के खुलासे ने हमको, आपको इस गंभीर समस्या से जुड़ी खामियों को उजागर कर दिया।

हालांकि, इस पूरे मामले में सवाल यह उठता है कि जिम्मेदारी तय क्यों नहीं होती। कई ब्लड बैंक बिना लाइसेंस के काम कर रहे हैं और मरीजों की जान जोखिम में पड़ती है। झारखंड में संचालित 82 ब्लड बैंकों में से 45 अभी लाइसेंस नवीनीकरण का इंतजार कर रहे हैं। कई ब्लड बैंक केवल चालान जमा कर संचालित हो रहे हैं। इनमें सरकारी और कई निजी अस्पतालों में चल रहे ब्लड बैंक भी शामिल हैं, जबकि सरकारी प्रावधानों के मुताबिक हर पांच साल पर ब्लड बैंकों को अपना लाइसेंस रिन्यू कराना जरूरी है और इस दौरान साढ़े चार साल का समय खत्म होते ही लाइसेंस को रिन्यू करने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।
झारखंड के कई अस्पताल अभी भी लाइसेंस नवीनीकरण का इंतजार कर रहे हैं। इनमें शेख भिखारी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल, सादर अस्पताल हज़ारबाग, डालटेंनगंज पलामू, गढ़वा, लातेहार, दुमका और कई अन्य सरकारी और निजी अस्पताल शामिल हैं। कई ब्लड बैंक नियमों का पालन नहीं कर रहे हैं, और यह मरीजों की जान के लिए खतरा पैदा करता है। स्वास्थ्य एजेंसी की शर्तों का उल्लंघन कई सालों से हो रहा है। इसका मुख्य कारण यह है कि ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया और केंद्रीय औषधि नियंत्रण निदेशालय के मानदंडों का पालन नहीं किया गया। कई ब्लड बैंक में बुनियादी सुविधाएं भी मौजूद नहीं हैं। राज्य औषधि निदेशालय की मौन सहमति और सिस्टम की खामियों का फायदा उठाकर कुछ ब्लड बैंक नियमों की अनदेखी कर रहे हैं।
यह घटना साफ कर देती है कि अगर स्वास्थ्य व्यवस्था में पारदर्शिता और कड़ी निगरानी नहीं होगी, तो मरीजों की जान जोखिम में पड़ सकती है। अब राज्य और केंद्र दोनों स्तर पर पूरी जांच हो रही है और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। यह घटना बाकी अस्पतालों और ब्लड बैंकों के लिए चेतावनी है कि नियमों का पालन करना ही सुरक्षित स्वास्थ्य सेवा का आधार है।
इस पूरी घटना ने यह साबित कर दिया कि मरीजों की जान बचाने के लिए ब्लड बैंक का सही संचालन, नियमों का पालन, पारदर्शिता और कड़ी निगरानी बेहद जरूरी है। स्वास्थ्य विभाग ने सख्त कदम उठाए हैं और उम्मीद है कि भविष्य में सभी ब्लड बैंक और अस्पताल नियमों का पालन करेंगे, ताकि कोई और ऐसा दुखद हादसा न हो।



