Thursday, May 28, 2026

असम में जिन आदिवासियों ने खून-पसीने से चाय बागान सींचे, उन्हें कुली कहना लोकतंत्र पर कलंक- हेमंत सोरेन

राँची/गुवाहाटी: झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने असम के चाय बागानों में कार्यरत लाखों आदिवासियों की दुर्दशा पर गहरा आक्रोश व्यक्त किया है। मुख्यमंत्री ने असम में रह रहे आदिवासी समाज की स्थिति को ऐतिहासिक विडंबना करार देते हुए कहा कि जिस समाज ने अपनी मेहनत से असम की अर्थव्यवस्था की रीढ़ खड़ी की, आज उसे ही उसके अधिकारों से वंचित कर हाशिए पर धकेल दिया गया है।

यह राजनीति नहीं, सम्मान की लड़ाई है- हेमंत

मुख्यमंत्री सोरेन ने कड़े लहजे में कहा कि चाय बागानों में काम करने वाले आदिवासियों का मुद्दा केवल चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ऐतिहासिक न्याय और सामाजिक गरिमा का सवाल है। उन्होंने सवाल उठाया कि जिन हाथों ने दशकों तक चाय के बागानों को हरा-भरा रखा, उन्हें आज तक जमीन का मालिकाना हक, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और सामाजिक बराबरी क्यों नहीं मिली?

टी-ट्राइब के कुली से संबोधन पर कड़ी आपत्ति

हेमंत सोरेन ने टी-ट्राइब (Tea Tribe) के लिए कुली शब्द के इस्तेमाल पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने इसे अपमान की विरासत बताते हुए कहा कि आदिवासियों को एक खास दायरे में सीमित करना और आज भी उन्हें कुली जैसे संबोधन से पुकारना, शोषणकारी मानसिकता का प्रतीक है। सोरेन के अनुसार, यह अपमानजनक शब्दावली सदियों से चले आ रहे शोषण को जारी रखने का एक जरिया है।

“आदिवासी समाज को गुलामों की तरह इस्तेमाल करने का दौर अब खत्म होना चाहिए। उन्हें कुली कहना हमारे लोकतंत्र पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न है।” — हेमंत सोरेन, मुख्यमंत्री (झारखंड)

ब्रिटिश काल के जख्म अब भी हरे- हेमंत

ऐतिहासिक संदर्भों का जिक्र करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि अंग्रेजों के शासनकाल में झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ से आदिवासियों को विस्थापित कर असम के बागानों में बंधुआ मजदूरों की तरह झोंक दिया गया था। उन्होंने अफ़सोस जताते हुए कहा कि देश को आजाद हुए सात दशक से अधिक बीत गए, लेकिन इन झारखंडी भाइयों की स्थिति में कोई बुनियादी बदलाव नहीं आया। आज भी यह समाज अपनी पहचान और अस्तित्व के लिए दर-दर भटक रहा है।

हेमंत सोरेन की स्पष्ट मांग

मुख्यमंत्री ने असम सरकार और केंद्र से आदिवासियों के लिए संवैधानिक अधिकारों की मांग करते हुए चार मुख्य बिंदु रखे:
संवैधानिक हक और आरक्षण: असम के चाय श्रमिकों को पूर्ण संवैधानिक मान्यता और आरक्षण का लाभ मिले।
जमीन का मालिकाना हक: दशकों से वहां रह रहे परिवारों को उस जमीन का पट्टा दिया जाए जहाँ वे बसे हुए हैं।
समान अवसर: शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में उन्हें अन्य नागरिकों के समान अवसर प्रदान किए जाएं।
ऐतिहासिक भूलों का सुधार: इतिहास में आदिवासियों के साथ हुए अन्याय को सुधारने के लिए ठोस नीति बने।

बढ़ सकती है सियासी तपिश

हेमंत सोरेन के इस बयान ने असम और झारखंड की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि सोरेन का यह रुख न केवल झारखंड के आदिवासियों के प्रति उनकी संवेदनशीलता को दर्शाता है, बल्कि पड़ोसी राज्यों में रह रहे आदिवासी समाज को एकजुट करने की एक बड़ी कोशिश भी है।

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