Monday, September 14, 2026

बिहार में दो फेज में चुनाव : 40 साल बाद नया पैटर्न, 6 और 11 नवंबर को तय होगी सत्ता की कुर्सी

बिहार :  बिहार में अब चुनावी बुखार चढ़ चुका है। तारीखें तय हो गई हैं. 6 नवंबर और 11 नवंबर। यही दो दिन तय करेंगे कि पटना की गद्दी पर किसकी सरकार बैठेगी। इस बार की सबसे बड़ी बात ये है कि बिहार में 40 साल बाद दो फेज में चुनाव हो रहे हैं। 6 अक्टूबर को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने ऐलान किया कि पहले फेज में 121 और दूसरे फेज में 122 सीटों पर वोटिंग होगी। नतीजे 14 नवंबर को आएंगे, यानी दीवाली के बाद बिहार का सियासी आसमान साफ हो जाएगा। आचार संहिता लगने से लेकर पहले फेज की वोटिंग तक ठीक एक महीने का वक्त है। लेकिन इस बार चुनाव आयोग ने वोटिंग पैटर्न बदल दिया है। पिछले तीन विधानसभा चुनावों में देखा गया था कि पहले फेज में मगध और शाहाबाद इलाके में वोटिंग होती थी, यानी दक्षिण बिहार में। लेकिन इस बार तस्वीर पलट गई है। पहले फेज में उत्तर बिहार की सीटें रखी गई हैं,तिरहुत, मिथिलांचल और कोसी इलाके की।

पहले फेज में NDA के गढ़ में मतदान

दरभंगा, मधेपुरा, सहरसा, खगड़िया, गोपालगंज, मुंगेर और नालंदा जैसे जिलों में पहले फेज में वोट डाले जाएंगे। दिलचस्प बात यह है कि यहां NDA मजबूत स्थिति में है। 2020 के चुनाव के आंकड़े देखें तो दरभंगा की 10 में से 9 सीटें NDA के पास थीं। समस्तीपुर की 10 में से 5, नालंदा की 7 में से 6, मुंगेर की 3 में से 2, सहरसा की 4 में से 3 सीटें NDA के खाते में गई थीं। यानी पहले फेज के ज्यादातर जिलों में NDA की स्थिति 2020 के हिसाब से काफी मजबूत दिखती है। पहले फेज की 121 सीटों में से करीब 70 सीटें तिरहुत और मिथिलांचल इलाके की हैं। तिरहुत की 64 सीटों में 36 NDA और 28 महागठबंधन के पास थीं। वहीं मिथिलांचल की 46 सीटों में से 30 NDA और 15 महागठबंधन के पास थीं। अगर 2020 के हिसाब से जोड़ें तो पहले फेज की कुल 121 सीटों में NDA के पास 59 और महागठबंधन के पास 61 थीं। दूसरे फेज की 122 सीटों में NDA के पास 66 और महागठबंधन के पास 49 सीटें थीं। यानी पिछले चुनाव का गणित बताता है कि दोनों के बीच कांटे की टक्कर है।

दूसरे फेज में महागठबंधन के मजबूत जिले

सीनियर पत्रकार इंद्रभूषण बताते हैं कि इस बार के दो फेज वाले चुनाव में महागठबंधन के मजबूत इलाके दो हिस्सों में बंट गए हैं। उन्होंने कहा कि “मगध और शाहाबाद के जिले जैसे गया, औरंगाबाद, जहानाबाद, नवादा, कैमूर, रोहतास इनमें दूसरे फेज में वोटिंग होगी। जबकि बक्सर, भोजपुर, नालंदा और पटना को पहले फेज में डाल दिया गया है।” यानी आयोग ने इस बार भौगोलिक नहीं, बल्कि रणनीतिक बैलेंस बनाया है। अब बात करते हैं लॉजिस्टिक्स और सिक्योरिटी की। चुनाव आयोग ने बिहार को दो फेज में बांटने के पीछे एक और वजह बताई है सुरक्षा और मूवमेंट। बॉर्डर वाले जिलों में दूसरे फेज में एक साथ वोटिंग होगी। बिहार के आठ जिले नेपाल से, तीन जिले पश्चिम बंगाल से और आठ जिले उत्तर प्रदेश से सटे हैं। आयोग ने इन जिलों को दूसरे फेज में रखा है ताकि पैरामिलिट्री फोर्स और चुनाव टीम को एक फेज के बाद आसानी से मूव किया जा सके।

सुरक्षा और लॉजिस्टिक्स पर फोकस

अब सवाल उठता है कि सीमांचल और झारखंड बॉर्डर के इलाके को क्यों सेंसिटिव कहा गया? एक्सपर्ट बताते हैं कि सीमांचल का इलाका बंगाल और बांग्लादेश से सटा है। BJP यहां घुसपैठ का मुद्दा उठाती रही है, इसलिए ये इलाका हमेशा सियासी और सुरक्षा दोनों लिहाज से संवेदनशील माना जाता है। वहीं, झारखंड से सटे जमुई, बांका और नवादा में नक्सली मूवमेंट की वजह से अतिरिक्त फोर्स की जरूरत पड़ती है। “पहले बिहार में हिंसा और बूथ उपद्रव की वजह से चुनाव कई फेज में कराने पड़ते थे। लेकिन अब पैरामिलिट्री की तैनाती से स्थिति काफी नियंत्रण में आ गई है।” अब सवाल ये कि कम फेज में वोटिंग से राजनीतिक समीकरण पर क्या असर पड़ेगा? पत्रकार इंद्रभूषण का कहना है कि “फेज कम होने से बागियों को खेल बिगाड़ने के मौके कम मिलेंगे।”

दरअसल, टिकट बंटवारे के बाद कई नेता असंतुष्ट होकर पार्टी के खिलाफ मैदान में उतर आते हैं। अगर चुनाव कई चरणों में हो, तो बागियों को समय मिल जाता है दूसरे जिलों में गड़बड़ी करने का। लेकिन दो फेज में सबकुछ फास्ट ट्रैक पर होगा। 2015 में जब चुनाव पांच फेज में हुए थे, तब BJP को नुकसान उठाना पड़ा था। पार्टी ने 157 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे, लेकिन जीत मिली सिर्फ 53 पर। वोट प्रतिशत के हिसाब से वो सबसे आगे थी, 25% वोट मिले थे, लेकिन सीटों के हिसाब से तीसरे नंबर पर आ गई। यानि इस बार दो फेज वाला चुनाव सिर्फ प्रशासनिक सुविधा नहीं, राजनीतिक दांव भी है। कम फेज में चुनाव कराने से BJP को फायदा मिल सकता है क्योंकि उसे लंबी अवधि की बगावतों और फील्ड में एंटी-इनकंबेंसी से जूझने का मौका कम मिलेगा। वहीं, महागठबंधन को अपने वोट ट्रांसफर और सीट एडजस्टमेंट का गणित तेजी से फाइनल करना होगा। कुल मिलाकर, 6 और 11 नवंबर सिर्फ तारीखें नहीं, बल्कि बिहार की अगली सरकार की दिशा तय करने वाले दो निर्णायक दिन हैं।

Also Read : बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की तारीखों का ऐलान : दो चरणों में चुनाव, 14 नवंबर को आएंगे नतीजे

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