बिहार : बिहार में चुनाव की तारीखों का ऐलान हो चुका है। 40 साल बाद ऐसा हो रहा है जब दो फेज में वोट होने जा रहे है। 6 और 11 नवंबर को वोटिंग होगी और नतीजे 14 नवंबर को आएंगे। यह पहला चुनाव होगा जिसमें JDU, RJD और भाजपा अब तक की सबसे कम सीटों पर चुनाव लड़ सकती हैं। 2015 चुनाव को छोड़कर। या यूं कहें कि छोटी पार्टियों को अपने पाले में करने के लिए बड़ी पार्टियां अपनी सीटों का त्याग कर रहीं हैं।
बड़ी पार्टियों का सीट त्याग, छोटी पार्टियों को तवज्जो
महागठबंधन और NDA में अभी सीटों का फॉर्मूला तय नहीं हुआ है। हालांकि, यह तय हो गया है कि दोनों गठबंधनों की सभी प्रमुख पार्टियां यानि कि BJP, JDU, RJD और कांग्रेस 2020 की तुलना में इस बार कम सीटों पर लड़ेगी। ये बड़ी पार्टियां अपनी सीटों का त्याग कर रही है। BJP और JDU की सीट शेयरिंग समझ लेते है। तो NDA में भाजपा 101 और JDU के 102 सीटों पर चुनाव लड़ने की संभावना जताई जा रही है, जो कि अगर पिछली बार कि बात करे तो भाजपा की 9 और JDU की 13 सीटें कम है। क्योंकि 2020 में भाजपा 110 सीटों पर लड़ा था और 74 सीट जीतीं थी । वहीं अगर JDU कि बात अकरे तो वो 115 सीटों पर चुनाव लड़ीं थी और 115 में से 43 सीट जीतीं थी। अब इनके साथ RJD और कांग्रेस का सीट बंटवारा समझ लेते है।
महागठबंधन में RJD 130 और कांग्रेस 55 सीटों पर लड़ सकती है, जो पिछली बार से RJD की 14 और कांग्रेस की 15 सीटें कम हैं। क्योंकि 2020 में RJD 144 सीटों पर लड़कर 75 जीतीं थीं। वहीं, कांग्रेस 70 सीटों पर चुनाव लड़ी थी जिसमे 19 जीतीं थी। अब फॉर्मूला समझिए न कि सीट शेयरिंग का पूरा खेल है क्या, तो NDA में JDU 102 बताया जा रहा है, BJP का 101, HAM का 7-8 सीट और RLM का भी 7-8 और LOJPA का यानि चिराग पासवान का 25-26 जो है संभावना जाताई जा रही है पर यहाँ खेल समझिए अगर आप चिराग पासवान या उनके पार्टी के लोग से बात करे तो वो लोग ये जरूर बोल रहा है कि इस बारी युवा बिहारी, मतलब है NDA कि गठबंधन के साथ पर खुलके नहीं बोल रहे क्यूंकी ये बताया जा रहा है कि चिराग इतनी सीटस से संतुष्ट नहीं है , वो ज़्यादा चाह रहे है। अब कितना भी कोई जुड़ जाए सब अपना ही चक्कर में है।
राजनीति का नया समीकरण
अब अगर थोड़ा-बहुत आंकड़े देखे तो वो इस तरफ इशारा कर रहे हैं कि बिहार कि दो बड़ी रिजनल पार्टियां धीरे धीरे सिमट रही है । क्योंकि 2015 विधानसभा चुनाव को अगर छोड़ दिया जाए तो बिहार की 2 बड़ी रीजनल पार्टियां लालू यादव की RJD और नीतीश कुमार की JDU इस बार यानी 2025 में सबसे कम सीटों पर चुनाव लड़ सकती है ऐसी अटकले लगाई जा रही है। हालांकि 2015 में लालू-नीतीश एक साथ चुनाव लड़े थे। इसलिए दोनों की सीटें 101-101 थी। पर इस बारी तो दोनों अलग अलग है। तो क्या महोल बंता है देखना दिलचस्प रहेगा। अब बीते 3 विधानसभा चुनाव (अक्टूबर 2005, 2010 और 2020) को देखें तो इस साल RJD की 45 सीटें घट सकती है। 2005 में RJD 175 सीटों पर चुनाव लड़ी थी । 2025 में 130 सीटों पर लड़ सकती है। वहीं JDU के चुनाव लड़ने के ग्राफ को देखें तो 2003 में पार्टी बनने के बाद JDU का सबसे अच्छा प्रदर्शन 2010 में था। पार्टी तब सबसे अधिक 141 सीटों पर चुनाव लड़ी और 115 जीतीं थी। अब 2005 की तुलना में JDU इस बार 37 सीटें कम पर चुनाव लड़ सकती है। 2005 में पार्टी 139 सीटों पर लड़ी थी और अब 2025 में 102 सीटों पर लड़ सकती है।
जब बड़ी पार्टियों की सीटें घट रही है और अगर ऐसा है तो तो कौन-सी पार्टियां बढ़ रही है फिर। क्योंकि अगर आंकड़ों को समझे तो आंकड़े ये बता रहे हैं कि भाजपा-कांग्रेस की सीटें जैसा का तैसा हैं। RJD-JDU की सीटें घट रही हैं। अब इसका कारण क्या हो सकता है, तो जवाब है नई पार्टियों का उभार मतलब कि पिछले चुनाव के मुताबिक अब नई पार्टियां भी तो उभर के आ रही है। अब इसमें जीतन राम मांझी की HAM है, उपेंद्र कुशवाहा की RLM, मुकेश सहनी की VIP, भाकपा माले शामिल हैं इस बार तो प्रशांत किशोर कि जनसुराज भी है। इन पार्टियों ने अपनी ताकत बढ़कर NDA और महागठबंधन दोनों ही अलायंस को अपनी तरफ किया है।
CPI (M-L) पार्टी बिहार के बंटवारे के बाद से लगातार चुनाव लड़ रही है, लेकिन उसे बड़ी कामयाबी 2020 विधानसभा चुनाव में महागठबंधन में शामिल होने पर मिली। 2005 चुनाव में 85 सीटों पर लड़कर 5 सीटें जीतीं। 2020 में 19 सीटों पर लड़कर 12 सीटें जीतीं। VIP मुकेश सहनी को पहली बार कामयाबी 2020 विधानसभा चुनाव में मिली। वह NDA में शामिल होकर 11 सीटों पर चुनाव लड़े और 4 जीते। 2019 और 2024 लोकसभा चुनाव में पार्टी का खाता नहीं खुला।
HAM मांझी की पार्टी पहली बार 2015 विधानसभा चुनाव में उतरी। NDA में शामिल होकर 21 सीटों पर लड़ी, सिर्फ 1 सीट जीती। 2020 में 7 सीटों पर लड़कर 4 जीतीं। RLM उपेंद्र कुशवाहा की नई पार्टी है। यह पहली बार चुनाव मैदान में उतरेगी। हालांकि, कुशवाहा इससे पहले राष्ट्रीय लोक समता पार्टी बनाकर चुनाव लड़ चुके हैं। 2014 लोकसभा चुनाव में तब 3 सीटें जीते थे। केंद्र में मंत्री बने। 2015 विधानसभा चुनाव में 2 सीटें जीते थे। वहीं, पिछले 4 विधानसभा चुनाव के आंकड़ों को देखें तो बिहार में राजनीतिक दलों की संख्या में साढ़े 3 गुना से ज्यादा बढ़ोतरी हुई है। अक्टूबर 2005 में 58 पार्टियां चुनावी मैदान में उतरीं। जिसमें से 46 पार्टियां एक सीट भी नहीं जीत पाईं। 2010 में 90 पार्टियां चुनाव लड़ीं, जिसमें से 83 पार्टियां एक भी सीट नहीं जीत पाईं। 2015 में 157 पार्टियां चुनाव लड़ीं, जिसमें से 149 पार्टियों का खाता तक नहीं खुला। 2020 में 212 पार्टियों ने प्रत्याशी उतारे, लेकिन 199 पार्टियों के एक भी विधायक नहीं बन पाए।
बढ़ती पार्टियों की संख्या
लेकिन बात ये है कि इन बड़ी पार्टियों के आगे छोटी पार्टियों के बढ़ने का कारण क्या है तो इस मामले में पटना यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस के प्रो. राकेश रंजन कहते हैं, ‘RJD और JDU सिर्फ कहने के लिए रीजनल पार्टियां हैं। उनका व्यहवार पूरी तरह नेशनल पार्टियों की तरह है। लोकल मुद्दों के मुकाबले राष्ट्रीय मसलों को ज्यादा तरजीह देती हैं। पहले नीतीश कुमार बिहार स्मिता की बातें करते थे। अब वह ऐसा कुछ नहीं कहते। वहीं लालू यादव शुरू से राष्ट्रीय मसलों को लेकर आगे रहे हैं। अब लोगों को ऐसी पार्टी की जरूरत है, जो स्थानीय मुद्दों पर बातें करें।’ प्रो. रंजन बताते हैं, ‘दोनों पार्टियां सिर्फ चुनाव के समय बिहार के इश्यूज को उठाती हैं, बाकी टाइम देश में हो रही घटनाओं को लेकर ज्यादा मुखर रहती हैं।’ पॉलिटिकल एनालिस्ट सत्यभूषण सिंह कहते हैं,कि ‘बीते 35 सालों से बिहार की राजनीति में सामाजिक ताना-बाना काफी मजबूत रहा है। सभी पार्टियां सामाजिक समीकरण साधकर सत्ता हासिल करती हैं और उन्हें फायदा पहुंचाती हैं। इसमें कुछ जातियां पीछे छूट जाती हैं। और उसी अंसतोष का नतीजा है मांझी, कुशवाहा और सहनी की पार्टी का जन्म।
सत्यभूषण सिंह कहते हैं, ‘जीतन राम मांझी, मुकेश सहनी और उपेंद्र कुशवाहा तीनों अपने समाज के नेता होने की दावेदारी करते हैं। उनके पास अपने समाज का वोट बैंक भी है। उनका समाज भी सत्ता का सुख भोगना चाहता है। सत्ता का सुख तब मिलेगा, जब उसके समाज का नेता होगा। प्रो. राकेश रंजन कहते हैं, ‘चिराग पासवान, जीतन राम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा के वोटबैंक में कोई पार्टी सेंधमारी नहीं कर पा रही है। काफी कोशिश की गई, लेकिन नहीं हो पाई। इसलिए सत्ता में आने के लिए अलायंस में इन पार्टियों को तव्वजों दी जाती है। तो अब बिहार इलेक्शन आ ही गया समझो, अब धीरे धीरे सब पता ही चल जाएगा और ये जीतने भी सीट कि संभावनाएँ है वो कितनी सच होती है क्या होता है वो भी पता चल जाएगा। तो आपको क्या लगता है कौंसि पार्टी सबसे ज़्यादा दावेदारी पेश करती है और किसको कितनी सीट मिलती है, अपनी राय हमे कमेन्ट सेक्शन में दे।
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