दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन लगातार जारी हैं। इस आंदोलन में छात्र संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विपक्षी दलों से जुड़े लोगों की भागीदारी देखने को मिली है। इसी सिलसिले में AISA यानी ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन के कार्यकर्ताओं ने भी प्रदर्शन किया। पुलिस ने कई छात्र नेताओं और प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि चुनावी प्रक्रिया को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब मिलना चाहिए और मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं की जांच होनी चाहिए।
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ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग क्यों उठ रही है?
इस विरोध प्रदर्शन की मुख्य वजह मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) को लेकर उठे सवाल हैं। विपक्षी दलों और प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया है कि मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने से मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। इसी आधार पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की जवाबदेही तय करने और उनके इस्तीफे की मांग की जा रही है।
हालांकि, चुनाव आयोग और बीजेपी ने चुनावी प्रक्रिया में पक्षपात के आरोपों को खारिज किया है। आयोग का कहना है कि मतदाता सूची में सुधार की प्रक्रिया के तहत अपात्र, दोहराए गए और अन्य संदिग्ध रिकॉर्ड की जांच की जाती है। इसलिए इस पूरे विवाद में आरोपों और आधिकारिक पक्ष, दोनों को समझना जरूरी है।
दिल्ली में प्रदर्शन, पुलिस की कार्रवाई और हिरासत
2 अक्टूबर को गांधी जयंती के दिन प्रदर्शनकारियों ने जंतर-मंतर की ओर मार्च करने की कोशिश की थी। पुलिस ने इलाके में बैरिकेडिंग की और कई लोगों को हिरासत में लिया। इसके बाद 4 और 5 अक्टूबर को भी विरोध प्रदर्शन हुए। 5 अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक, AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा और सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव समेत करीब 120 लोगों को हिरासत में लिया गया था। पुलिस के अनुसार, हिरासत में लिए गए लोगों को बाद में छोड़ दिया गया।
इन कार्रवाइयों के बावजूद प्रदर्शनकारियों ने आंदोलन जारी रखने की बात कही। AISA की अध्यक्ष नेहा बोरा भी प्रदर्शन में शामिल रहीं। छात्र संगठनों का कहना है कि चुनावी पारदर्शिता और लोकतांत्रिक जवाबदेही से जुड़े सवालों को उठाना जरूरी है।
10 अक्टूबर को भी सड़कों पर उतरे प्रदर्शनकारी
10 अक्टूबर को दिल्ली में प्रस्तावित बड़े प्रदर्शन से पहले जंतर-मंतर और आसपास के इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई थी। प्रदर्शनकारियों को मुख्य प्रदर्शन स्थल तक पहुंचने में बाधाओं का सामना करना पड़ा। इसके बाद दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में छोटे-छोटे विरोध प्रदर्शन हुए। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, AISA और स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) जैसे संगठनों के कार्यकर्ताओं ने भी अलग-अलग स्थानों पर प्रदर्शन किया।
इसी दिन AISA और वामपंथी संगठनों के कार्यकर्ताओं ने बीजेपी मुख्यालय के बाहर भी प्रदर्शन किया और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग उठाई। पुलिस ने कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया। इस घटनाक्रम से साफ है कि विरोध अब केवल एक जगह तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्रदर्शनकारियों ने दूसरे स्थानों पर भी अपनी बात रखने की कोशिश की।
SIR और चुनावी पारदर्शिता पर बहस
मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया चुनाव व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन जब इस प्रक्रिया को लेकर बड़े राजनीतिक सवाल उठते हैं, तो पारदर्शिता, सत्यापन और शिकायतों के निपटारे की व्यवस्था पर चर्चा जरूरी हो जाती है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि जिन मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटे हैं, उनके अधिकारों की रक्षा की जानी चाहिए।
दूसरी ओर, चुनाव आयोग और बीजेपी का पक्ष है कि मतदाता सूची की समीक्षा का उद्देश्य रिकॉर्ड को दुरुस्त करना है। ऐसे में किसी भी आरोप की जांच तथ्यों और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर की जानी चाहिए।
AISA और अन्य छात्र संगठनों के प्रदर्शन ने इस बहस को फिर चर्चा में ला दिया है। ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग के साथ-साथ आंदोलन का केंद्र चुनावी प्रक्रिया पर भरोसा और संस्थागत जवाबदेही भी है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि चुनाव आयोग इन सवालों पर क्या प्रतिक्रिया देता है और प्रदर्शनकारी आगे अपनी रणनीति किस तरह तय करते हैं।

