Thursday, May 28, 2026

AIMIM का सफर: सीमांचल में Owaisi की एंट्री

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन यानि (AIMIM) की शुरुआत हैदराबाद से हुई थी। इसके संस्थापक अब्दुल वाहीद ओवैसी ने 1958 में इसे राजनीतिक रूप में दोबारा स्थापित किया। बाद में असदुद्दीन ओवैसी ने पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। ओवैसी अपने जोशीले भाषणों और संसद में मुसलमानों, पिछड़ों और गरीबों के मुद्दे उठाने के लिए जाने जाते हैं। धीरे-धीरे उन्होंने पार्टी को हैदराबाद से निकालकर महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में फैलाया।

बिहार में एंट्री और सीमांचल पर फोकस

बिहार में AIMIM की एंट्री 2015 के विधानसभा चुनावों से हुई। उस वक्त राज्य की राजनीति नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव और बीजेपी जैसी बड़ी पार्टियों के इर्द-गिर्द घूम रही थी। लेकिन जब ओवैसी ने सीमांचल के क्षेत्रों — किशनगंज, कटिहार, अररिया और पूर्णिया — में अपने उम्मीदवार उतारे और खुद वहां प्रचार किया, तो लोगों का ध्यान उनकी ओर गया।
सीमांचल इलाका मुस्लिम बहुल है लेकिन विकास के मामले में काफी पिछड़ा रहा है। ओवैसी ने लोगों को यही कहा — बरसों से आपको अनदेखा किया गया है, अब अपनी आवाज खुद उठाइए।

2015 में शुरुआत, 2020 में बड़ी सफलता

2015 के चुनावों में AIMIM को बड़ी सफलता नहीं मिली, लेकिन उसने सीमांचल में अपनी जड़ें मजबूत कर लीं। फिर आया 2020 का विधानसभा चुनाव, जिसने सबको चौंका दिया। AIMIM ने पांच सीटें जीतीं — अमौर, बहादुरगंज, जोकीहाट, बैसी और अररिया क्षेत्र के आसपास।
यह पार्टी की बिहार में अब तक की सबसे बड़ी जीत थी। लोगों ने माना कि ओवैसी ने सीमांचल के लोगों में वह भरोसा पैदा किया, जो पहले किसी ने नहीं किया था। इस जीत ने AIMIM को बिहार की राजनीति में एक नई ताकत के रूप में पेश किया।

गठबंधन की कोशिशें और चुनौतियाँ

बिहार जैसे राज्य में राजनीति सिर्फ जनसमर्थन से नहीं, बल्कि गठबंधन से भी चलती है। ओवैसी ने भी 2020 से पहले RJD से सीट बंटवारे की कोशिश की थी। उन्होंने कहा था कि अगर विपक्ष सच में मुसलमानों और पिछड़ों की आवाज बनना चाहता है, तो सीमांचल की कुछ सीटें AIMIM को दी जाएं।
लेकिन RJD तैयार नहीं हुई, क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि मुस्लिम वोट बंटें। इस पर ओवैसी ने कहा, “हम किसी की जेब में नहीं हैं, हम अपनी आवाज खुद बनाना चाहते हैं।” इसके बाद AIMIM ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया।

विधायकों का पलायन और नई रणनीति

2022 में AIMIM के पांच में से चार विधायक RJD में शामिल हो गए। इस पर ओवैसी ने कहा, “हम जनता के बीच हैं, जनता ही हमारी असली ताकत है।” इसके बाद उन्होंने सीमांचल में फिर से जनसंपर्क बढ़ाया और कहा कि उनकी लड़ाई सिर्फ राजनीति की नहीं, बल्कि सम्मान और हक की है।

सीमांचल से आगे बढ़ने की कोशिश

फिलहाल AIMIM का प्रभाव सीमांचल तक सीमित है, लेकिन पार्टी धीरे-धीरे बाकी जिलों में भी पकड़ बनाने की कोशिश कर रही है। ओवैसी के भाषण और सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो के कारण युवा वर्ग, खासकर मुस्लिम और पिछड़े छात्र, पार्टी की ओर आकर्षित हो रहे हैं। पार्टी का नारा है — “विकास का हक हर किसी का है, सिर्फ वादों से नहीं, हकीकत से।”

सीमांचल की उम्मीद

5सीमांचल के लोग आज AIMIM को एक ऐसे विकल्प के रूप में देखते हैं जो उनकी आवाज दिल्ली और पटना तक पहुंचा सके। भले ही RJD, JDU और BJP जैसी बड़ी पार्टियाँ इस क्षेत्र में सक्रिय हों, लेकिन AIMIM ने अपनी अलग पहचान बना ली है। ओवैसी कहते हैं, “हम धर्म या जाति की राजनीति नहीं करते, हम इंसाफ की बात करते हैं।”

उम्मीदों की नई रोशनी

कुल मिलाकर AIMIM का बिहार में सफर अभी शुरुआती दौर में है, लेकिन यह साफ है कि पार्टी ने सीमांचल के लोगों के दिलों में उम्मीद की एक नई किरण जगाई है। भले ही उसे गठबंधन की राजनीति और अन्य दलों की प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा हो, पर ओवैसी का आत्मविश्वास और जनता से जुड़ाव पार्टी को आगे बढ़ा रहा है।
अभी के चुनावों की दृष्टि से देखा जाए तो AIMIM सीमांचल पर केंद्रित है, और सिवान जैसे जिलों में भी धीरे-धीरे अपनी जड़ें फैलाने की कोशिश कर रही है। अब देखना यह होगा कि आने वाले चुनावों में क्या AIMIM सीमांचल की आवाज बनकर उभर पाएगी या नहीं।

एयर नाउ स्पेशल

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