Sunday, September 20, 2026

JNU छात्र संघ चुनाव में संयुक्त वामपंथी संगठनों की शानदार जीत, अदिति मिश्रा बनीं अध्यक्ष

देश  :  बिहार विधानसभा चुनाव में गुरूवार को जब पहले चरण के लिए 121 सीटों पर मतदान हो रहा था तो ठीक उसी समय बिहार से लगभग एक हजार किलोमीटर दूर स्थित दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में छात्र संघ चुनाव को लेकर मतों की भी गिनती हो रही थी. शाम होते होते बिहार ने जहां एक नया इतिहास रचते हुए पहले चरण में रिकार्ड लगभग 65 फीसदी मतदान दर्ज किए तो वहीं जेएनयू में भी वामपंथियों के संयुक्त मोर्चे ने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के वामपंथियों के इस गढ़ को ध्वस्त करने का सपना तोड़ते हुए एक बार फिर से अपनी जीत के झंडे गाड़ दिए. वामपंथियों ने अध्यक्ष समेत सभी प्रमुख पदों पर कब्जा जमाया तो वहीं भाजपा के छात्र संगठन ABVP और कांग्रेस के NSUI समेत अन्य संगठनों को करारी शिकस्त झेलनी पड़ी. महज आठ महीने पहले हुए चुनाव में ABVP को एक सीट मिली थी लेकिन इस बार संगठन ने वह भी गंवा दी.

उत्तर प्रदेश के वाराणसी से ताल्लुक रखने वाली अदिति मिश्रा जेएनयू छात्र संघ की नई अध्यक्ष होंगी. 4 नवंबर को हुए चुनाव में उन्होंने ABVP के विकास पटेल को 414 वोटों के बड़े अंतर से हराया. इसी तरह (के. गोपिका) उपाध्यक्ष, सुनील यादव महासचिव और दानिश संयुक्त सचिव के पद पर विजयी हुए. इस जीत के साथ लेफ्ट यूनाइटेड ने छात्र राजनीति में अपनी मजबूत पकड़ साबित की है.

नई अध्यक्ष बनी अदिति मिश्रा का बिहार से गहरा नाता रहा है. उन्होंने बिहार से अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय यानी (BHU)बीएचयू से अर्थशास्त्र में ग्रैजुएशन किया. बीएचयू में ही उन्होंने अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की. सितंबर 2017 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) में हुए छात्र आंदोलन में, बतौर स्नातक छात्रा उन्होंने सक्रिय रूप से हिस्सा लिया. 2018 में अदिति ने पांडिचेरी विश्वविद्यालय में दाखिला लिया, जहां उन्होंने हिंदुत्व विचारधारा के प्रसार और भगवाकरण के खिलाफ आवाज उठाई. उन्होंने कुलपति कार्यालय का घेराव किया. 2019 में जब विश्वविद्यालय प्रशासन ने फीस में भारी बढ़ोतरी की, तो छात्रों ने प्रशासनिक भवन का लॉकडाउन किया. इस आंदोलन में अदिति अग्रणी रहीं. उन्होंने न केवल फीस वृद्धि के खिलाफ बल्कि सीएए विरोध प्रदर्शनों में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. 2020 में जब यह आंदोलन तेज हुआ, तब अदिति ने वंचित तबकों के छात्रों के हक में जोरदार आवाज उठाई. वर्तमान में अदिति जेएनयू के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज़ (SIS) के सेंटर फॉर कॉम्परेटिव पॉलिटिक्स एंड पॉलिटिकल थ्योरी (CCPPT) से उत्तर प्रदेश में लैंगिक हिंसा और 2012 के बाद महिलाओं के प्रतिरोध विषय पर पीएचडी कर रही हैं.
उपाध्यक्ष पद पर चुनाव जीतने वाली के गोपिका केरल से आती हैं और स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया की सक्रिय कार्यकर्ता है. वो जेएनयू में सेंटर फॉर स्टडी ऑफ लॉ एंड गवर्नेंस की पीएचडी स्कॉलर हैं. जेएनयू में छात्रों की मांगों को लेकर हुए विरोध प्रदर्शनों में गोपिका अक्सर आवाज बुलंद करने नजर आती रही हैं. के. गोपिका ने साल 2022 में जेएनयू में MA समाजशास्त्र में प्रथम वर्ष की छात्रा के रूप में शामिल हुईं और अपने पहले सेमेस्टर से ही छात्र आंदोलन का सक्रिय हिस्सा रही हैं. उन्होंने इससे पहले दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस में पढ़ाई की थी. गोपिका का नाम भी उस समय मुख्य तौर पर उभर कर सामने आया जब उन्होंने छात्र संघ चुनावों को फिर से शुरू करने की मांग वाले अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

जेएनयू छात्रसंघ चुनाव में महासचिव पद पर जीतने वाले लेफ्ट के उम्मीदवार सुनील यादव यूपी के बस्ती जिले के रहने वाले हैं. सुनील यादव फिलहाल JNU में सेंटर फॉर यूरोपियन स्टडीज में PHD कर रहे हैं. मिली जानकारी के अनुसार सुनील अपने परिवार के पहले सदस्य हैं जिन्होंने स्नातक की पढ़ाई पूरी की. सुनील के पिता सरकारी विद्यालय में ग्रुप डी श्रेणी के कर्मचारी है. जबकि मां गृहिणी है. सुनील ने डीयू से वर्ष 2021 में स्नातक किया है. उसके बाद JNU में MA कोर्स में दाखिला लिया. वर्ष 2022 में वह स्टूडेंट फैकल्टी कोऑर्डिनेटर के तौर पर चुने गए. सुनील ने ऑफलाइन क्लास की मांग को लेकर चले आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई.

जेएनयू छात्रसंघ चुनाव में संयुक्त सचिव पर जीत हासिल करने वाली दानिश अली मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले की रहने वाली हैं. वो जेएनयू के स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज में सीएचएस में पीएचडी की प्रथम वर्ष की छात्रा है. दानिश अली स्कूल के दिनों में स्टेट लेवल की थ्रोबॉल और क्रिकेट खिलाड़ी रही हैं. दानिश के माता-पिता दोनों सरकारी टीचर है. पिता रिटायर हो चुके हैं. जबकि मां एक सरकारी स्कूल की प्रिंसिपल हैं. दानिश ने इतिहास विषय में स्नातक की पढ़ाई दिल्ली विश्वविद्यालय के एसजीटीबी खालसा कॉलेज से की. CAA के समर्थन में हुए विरोध में भी दानिश सक्रिय थी.

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जेएनयू छात्र संघ चुनावों में लेफ्ट यूनिटी की जीत ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि JNU में लेफ्ट का दबदबा सिर्फ इतिहास नहीं है, बल्कि यह लगातार विकसित हो रहा है, बदल रहा है और प्रेरित कर रहा है. 2025 के चुनाव के नतीजे सिर्फ यह नहीं बताता कि छात्र संघ का नेतृत्व कौन करेगा, बल्कि यह भी बताता है कि JNU भारत की अकादमिक और राजनीतिक चेतना की बड़ी कहानी में क्या प्रतीक है। अंत में, JNUSU चुनावों ने एक जानी-पहचानी सच्चाई को फिर से साबित किया है कि JNU में राजनीति सिर्फ वोट तक सीमित नहीं है। यह हर बहस में, हर नारे में और हर उस छात्र में जीवित है जो सवाल पूछने की हिम्मत करता है।

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