पंजाब: उड़ता पंजाब, साल 2016 में आई इस फिल्म में शाहिद कपूर और आलिया भट्ट मुख्य भूमिका में थे, यह फिल्म पंजाब के ऐसे युवाओं को केंद्र में रखकर बनाई गई थी, जो नशे की चपेट में होते हैं और नशे के खातिर अपना सबकुछ बर्बाद करने को उतारू हो जाते हैं. शाहिद कपूर का किरदार चर्चित रैपर का था, जो नशे का शिकार होने के बाद अपनी लोकप्रियता खोने लगता था. कहा यह भी जाता है कि यह किरदार सुप्रसिद्ध गायक यो यो हनी सिंह से प्रेरित था. इस फिल्म और कहानी की चर्चा आज इसलिए क्योंकि पंजाब में एक बड़ा खुलासा हुआ है. ये कहानी एक ऐसे डॉक्टर की है जो लोगों को नशे से छुड़ाने का दावा करता था, लेकिन खुद उसी रास्ते पर गलत काम कर बैठा। मामला है डॉक्टर अमित बंसल का, जो पंजाब में 22 डि-एडिक्शन यानी नशा छुड़ाने वाले सेंटर चलाता था। बाहर से देखने पर ये सेंटर लोगों की मदद के लिए बनाए गए लगते थे, लेकिन जांच में पता चला कि इन जगहों पर नशे की दवाओं की अवैध बिक्री हो रही थी।
ED ने दर्ज करवाया मनी लॉन्डिंग का केस
इस पूरे मामले की जांच अब ED कर रही है। ईडी ने इस पर मनी लॉन्ड्रिंग यानी अवैध पैसे को सफेद बनाने का केस दर्ज किया है। रिपोर्टों के मुताबिक, डॉक्टर बंसल और उनके परिवार ने इन 22 डि-एडिक्शन सेंटर्स के ज़रिए वो दवाइयाँ बेचीं जो असल में सिर्फ उन मरीजों को दी जाती हैं जो नशे की लत छोड़ने के लिए इलाज में होते हैं। ये दवा है BNX (बुप्रेनोर्फिन/नालोक्सोन) . ये दवा सिर्फ डॉक्टर की देखरेख में, और सरकारी अनुमति वाले केंद्रों पर ही दी जा सकती है। लेकिन यहाँ इसे खुले बाजार में बेचा जा रहा था।
21 करोड़ रुपये के बैंक अकाउंट फ्रीज
जांच में सामने आया कि इन सेंटर्स में से कई जगहों पर दवा का स्टॉक गायब था। कुछ जगहों पर पाया गया कि दवाएं उन लोगों को भी बेची जा रही थीं जो किसी रजिस्टर में दर्ज नहीं थे, यानी जिनका इलाज आधिकारिक रूप से नहीं चल रहा था। इसका मतलब साफ है कि दवाएं बाहर के लोगों को, काले बाजार में बेची जा रही थीं। इससे न सिर्फ कानून का उल्लंघन हुआ बल्कि नशे के खिलाफ चल रहे अभियान को भी बड़ा झटका लगा।
ईडी की टीम ने जब छापेमारी की, तो उन्हें करोड़ों रुपये का लेनदेन मिला जो संदिग्ध था। एजेंसी ने डॉक्टर बंसल और उनके परिवार से जुड़े लगभग 21 करोड़ रुपये के बैंक अकाउंट फ्रीज कर दिए। इसके अलावा, करीब 8.93 करोड़ रुपये की संपत्ति को भी जब्त कर लिया गया है। माना जा रहा है कि ये सारी संपत्तियाँ अवैध रूप से कमाए गए पैसे से खरीदी गई थीं। इस पूरे मामले ने पंजाब सरकार और प्रशासन की नींद उड़ा दी है।
राज्य में पहले से ही नशे की समस्या
राज्य में पहले से ही नशे की समस्या बहुत बड़ी है, और ऐसे में जब नशा छुड़ाने वाले ही गलत रास्ते पर निकल जाएं, तो सवाल उठना जायज है। अब सरकार इस बात पर विचार कर रही है कि निजी डि-एडिक्शन सेंटर्स पर सख्त निगरानी रखी जाए और उनकी नियमित जांच की जाए, ताकि इस तरह की गड़बड़ियां दोबारा न हों। क्योंकि जांच के दौरान ये भी सामने आया कि कुछ स्थानीय अफसर और निरीक्षक भी इस खेल में शामिल हो सकते हैं। यानी बिना उनकी मिलीभगत के इतनी बड़ी मात्रा में दवाएं बाहर बेचना मुश्किल था। ईडी अब ये पता लगा रही है कि किन लोगों ने इस गड़बड़ी को छिपाने में मदद की और किस-किस को पैसे दिए गए।
डि-एडिक्शन सेंटर्स से उठने लगा लोगों का भरोसा
इस मामले का असर केवल कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक भी है। पंजाब जैसे राज्य में जहां पहले से नशे की समस्या गहरी है, वहां लोगों का भरोसा अब डि-एडिक्शन सेंटर्स से उठने लगा है। जब इलाज देने वाले ही इलाज को बेचने लगें, तो समाज में नशे के खिलाफ लड़ाई और भी कठिन हो जाती है। ये मामला दिखाता है कि कैसे कुछ लोग समाज की भलाई के नाम पर पैसा कमाने का जरिया बना लेते हैं। डॉक्टर अमित बंसल का मामला एक ऐसी सच्चाई है कि सिस्टम में अगर निगरानी कमजोर हो, तो लोग उसका फायदा उठाते हैं। अब यह देखना होगा कि ईडी की जांच आगे क्या खुलासे करती है और क्या इन 22 डि-एडिक्शन सेंटर्स में और भी लोग शामिल थे।
पंजाब में पहले ही कई युवा नशे की गिरफ्त में
मामला अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। जांच चल रही है और कई नए नाम सामने आने की उम्मीद है। ईडी के अनुसार, दवाओं की बिक्री से जो पैसा कमाया गया, उसे बैंक खातों के ज़रिए घुमाकर वैध दिखाने की कोशिश की गई। इसे ही मनी लॉन्ड्रिंग कहा जाता है। कई दस्तावेज़, रजिस्टर और कंप्यूटर रिकॉर्ड भी जब्त किए गए हैं जिनसे साफ पता चल रहा है कि ये काम लंबे समय से चल रहा था। इस पूरे प्रकरण ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है . क्या पंजाब में चल रहे सैकड़ों निजी नशा मुक्ति केंद्र सही तरीके से काम कर रहे हैं? या फिर उनमें से कुछ सिर्फ नाम के लिए बने हैं और पीछे से दवाओं की अवैध बिक्री का धंधा चल रहा है? सरकार अब इस दिशा में एक नई नीति बनाने पर विचार कर रही है ताकि आने वाले समय में हर केंद्र की जांच हो और मरीजों का असली इलाज सुनिश्चित किया जा सके। लोगों का कहना है कि नशे से मुक्त होने के लिए भरोसे का माहौल जरूरी है। अगर वही सेंटर भरोसे को तोड़ दें, तो समाज के लिए ये और भी बड़ा खतरा बन जाता है। पंजाब में पहले ही कई युवा नशे की गिरफ्त में हैं, ऐसे में इलाज केंद्रों का ग़लत इस्तेमाल समाज के लिए दोहरी मार जैसा है।
पंजाब को ड्रग्स मुक्त करने का वादा
पंजाब में नशे की समस्या लंबे समय से एक गंभीर चुनौती रही है। राज्य के सभी ज़िलों में नशा मुक्ति केंद्र पहले से चल रहे हैं, और पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने विशेष क्लिनिक भी शुरू किए हैं। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि जबरन इलाज कराने से यह योजना सफल नहीं होगी। उनका मानना है कि नशे से छुटकारा तभी संभव है जब मरीज़ खुद इसकी इच्छा रखे। डॉक्टरों के अनुसार, जब तक कई विभाग मिलकर गंभीरता से इस दिशा में काम नहीं करेंगे, तब तक समस्या खत्म नहीं होगी। 2007 से अब तक कई सरकारें आई .अमरिंदर सिंह ने तो चार हफ़्तों में पंजाब को ड्रग्स मुक्त करने का वादा भी किया था—लेकिन हालात में बहुत सुधार नहीं हुआ। पहले की एनडीए सरकार ने भी 2014 में अभियान चलाया था, पर संख्या धीरे-धीरे घटती गई। सवाल अब भी वही है—क्या मौजूदा कदम पंजाब को सच में नशामुक्त बना पाएंगे
नशे के खिलाफ जंग अधूरी
अंत में कहा जा सकता है कि डॉक्टर अमित बंसल का मामला सिर्फ एक व्यक्ति या एक संगठन की गलती नहीं है, बल्कि ये सिस्टम की लापरवाही की भी निशानी है। जब तक सख्त कार्रवाई नहीं होगी और हर डि-एडिक्शन सेंटर की जांच नियमित नहीं की जाएगी, तब तक नशे के खिलाफ जंग अधूरी रहेगी। यह घटना सबके लिए चेतावनी है कि नशे के इलाज का काम सिर्फ पैसे कमाने का साधन नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे इंसानियत और समाज की जिम्मेदारी समझकर निभाना चाहिए।


