रांची : झारखंड सरकार के लिए एक नई चुनौती सामने आई है, जिसमें वन सचिव और पूर्व प्रधान मुख्य वन संरक्षक (पीसीसीएफ) की भूमिका संदिग्ध बताई जा रही है। इन दोनों अधिकारियों की कथित लापरवाही और गलत निर्णयों के कारण राज्य सरकार को 13 लाख करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान होने का अनुमान है।
सारंडा क्षेत्र को Sanctuary घोषित करने में देरी
सारंडा वन क्षेत्र को वन्यजीव संरक्षित क्षेत्र (Sanctuary) घोषित करने की प्रक्रिया में इन अधिकारियों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। 29 अप्रैल 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि इस क्षेत्र को Sanctuary घोषित करने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएं। हालांकि, वन सचिव अबुबकर सिद्दीकी और पूर्व पीसीसीएफ की ओर से इस मामले में कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए, जिससे प्रक्रिया में देरी हुई।
आर्थिक नुकसान का अनुमान
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि सारंडा क्षेत्र को समय पर Sanctuary घोषित किया गया होता, तो राज्य सरकार को 13 लाख करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त हो सकता था। यह राशि वन्यजीव पर्यटन, जैव विविधता संरक्षण, और पर्यावरणीय सेवाओं के माध्यम से अर्जित की जा सकती थी। लेकिन अधिकारियों की लापरवाही के कारण यह अवसर हाथ से निकल गया।
सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी
17 सितंबर 2025 को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जताई थी। न्यायालय ने कहा था कि यदि 29 अप्रैल 2025 के आदेश का अनुपालन नहीं किया गया, तो वह परम आदेश (Mandamus) जारी कर राज्य सरकार को बाध्य कर सकती है। इसके अलावा, मुख्य सचिव को अवमानना नोटिस जारी किया गया था और उन्हें 8 अक्तूबर 2025 को सशरीर कोर्ट में हाजिर होने का निर्देश दिया गया है।
आगे की कार्रवाई
राज्य सरकार को अब इस मामले में त्वरित और प्रभावी कदम उठाने की आवश्यकता है। यदि अधिकारियों की लापरवाही और गलत निर्णयों की जांच होती है, तो उन्हें कड़ी सजा मिल सकती है। इसके अलावा, सरकार को इस क्षेत्र को Sanctuary घोषित करने की प्रक्रिया को शीघ्रता से पूरा करना होगा, ताकि संभावित आर्थिक नुकसान को कम किया जा सके।


