नई दिल्ली: पूर्व केंद्रीय मंत्री व भाजपा नेता आरके सिंह ने एसआईआर को लेकर एक्स पर एक लंबी पोस्ट लिखी है. इसमें उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि देशभर में एसआईआर लागू करने का फैसला जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21 के विपरीत था.
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उनके अनुसार, कानून में विशेष परिस्थितियों में केवल किसी विशेष निर्वाचन क्षेत्र या उसके हिस्से में ही विशेष पुनरीक्षण की अनुमति है, न कि पूरे देश में. सिंह ने कहा कि धारा 21 के तहत पुनरीक्षण प्रक्रिया पूरी होने और उससे जुड़ी सभी अपीलों के निपटारे तक पुरानी मतदाता सूची प्रभावी रहती है. इसके बावजूद, अपीलों के लंबित रहने के दौरान संशोधित मतदाता सूची का इस्तेमाल चुनावों में किया गया, जो अवैध था.
उन्होंने धारा 22 का हवाला देते हुए कहा कि किसी मतदाता का नाम केवल निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ) ही निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुए हटा सकता है. उनका आरोप है कि 2003 के बाद जोड़े गए मतदाताओं के नाम बिना जांच, बिना नोटिस और बिना सुनवाई के हटाए गए.
आरके सिंह ने कहा कि प्रभावित मतदाताओं को नए सिरे से फॉर्म-6 भरने के लिए मज़बूर किया गया, जो सुप्रीम कोर्ट के लाल बाबू हुसैन बनाम निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी मामले में दिए गए फैसले के ख़िलाफ़ है. उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग ने सबूत का भार मतदाताओं पर डाल दिया, जबकि क़ानून के अनुसार नाम हटाने का आधार साबित करने की ज़िम्मेदारी प्रशासन की होती है. उन्होंने इसे कानून और स्थापित न्यायिक सिद्धांतों के विपरीत बताया.


