देश : सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने गुरुवार को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को भेजे गए 14 संवैधानिक प्रश्नों पर अहम फैसला सुनाया। मुख्य न्यायाधीश (CJI) बी आर गवई की अगुवाई वाली पीठ ने अपने पुराने फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें राज्यपाल और राष्ट्रपति को किसी भी राज्य के बिल पर तीन महीने के भीतर निर्णय लेने का निर्देश दिया गया था।
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समयसीमा तय करने की मांग खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 200 और 201 में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि अदालत या विधानमंडल राज्यपाल/राष्ट्रपति पर निश्चित समयसीमा लागू कर सके। CJI गवई ने कहा कि राज्यपाल और राष्ट्रपति जैसे संवैधानिक पदों पर समयसीमा थोपना अदालत के अधिकार क्षेत्र से बाहर है। हालाँकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अनुचित देरी नहीं की जानी चाहिए, क्योंकि इसका असर शासन व्यवस्था पर पड़ता है।
पीठ ने कहा कि संविधान के तहत राज्यपाल के पास तीन विकल्प होते हैं, पहला बिल को मंजूरी देना, दुसरा बिल को पुनर्विचार के लिए विधानसभा को वापस भेजना और तीसरा बिल को राष्ट्रपति के पास भेजना। कोर्ट ने यह भी साफ कहा कि राज्यपाल बिल को अनिश्चित समय तक लंबित नहीं रख सकते।
सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में राज्यपाल के लिए तय समयसीमा बनाना संविधान की भावना के खिलाफ है। पीठ ने कहा, “संवैधानिक पदों पर आसीन लोगों को टकराव नहीं, बल्कि संवाद और सहयोग की भावना से काम करना चाहिए।”
न्यायिक दखल सीमित
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी मान लिया कि राज्यपाल और राष्ट्रपति के निर्णय लेने की प्रक्रिया में अदालत बहुत अधिक हस्तक्षेप नहीं कर सकती। लेकिन अदालत यह देख सकती है कि बिलों पर मनमानी देरी न हो। यह फैसला राज्य सरकारों और राज्यपालों के बीच चल रहे कई विवादों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालेगा।


