रांची : जेल में बंद निलंबित IAS अधिकारी विनय चौबे एक बार फिर चर्चाे में आ गाए हैं। डॉ. नंद कुमार बेड़ा के बयानों ने काले धन को सफेद करने के कथित नेटवर्क पर से पर्दा उठाया है, जिसमें जेल में बंद निलंबित IAS अधिकारी विनय चौबे और बिल्डर शिपिज त्रिवेदी के नाम चर्चा में आ गए हैं। आरोप है कि रांची का रियल एस्टेट सेक्टर लंबे समय से अवैध धन के निवेश का जरिया बनता जा रहा है।
डॉ. बेड़ा ने दावा किया है कि इस सिंडिकेट का तरीका बेहद सुनियोजित है। अवैध कमाई को बेनामी संपत्तियों में निवेश करने के लिए संपत्ति किसी और के नाम पर खरीदी जाती है, जबकि उसका वास्तविक नियंत्रण सिंडिकेट से जुड़े लोगों के पास रहता है। असली मालिक हमेशा पर्दे के पीछे रहता है, ताकि उसकी पहचान सामने न आ सके। खुलासे के मुताबिक, संपत्ति की रजिस्ट्री के समय उसकी कीमत बाजार मूल्य से काफी कम दिखाई जाती है। वास्तविक कीमत और रजिस्ट्री मूल्य के बीच का अंतर नकद भुगतान के जरिए पूरा किया जाता है। इससे एक ओर सरकार को राजस्व का नुकसान होता है, वहीं दूसरी ओर काले धन को ठिकाने लगाने का रास्ता साफ हो जाता है।
डॉ. बेड़ा के अनुसार, भुगतान भी उस व्यक्ति के खाते में नहीं किया जाता, जिसके नाम पर संपत्ति दर्ज होती है। इसके बजाय यह रकम सिंडिकेट से जुड़े किसी तीसरे व्यक्ति या संस्था के खाते में भेजी जाती है, ताकि पैसों का लेन-देन ट्रैक न किया जा सके। इस प्रक्रिया के जरिए मनी ट्रेल को कमजोर करने की कोशिश की जाती है। मामले में सबसे गंभीर आरोप यह है कि शिपिज त्रिवेदी ने डॉ. बेड़ा को सीधे 25 लाख रुपये नकद दिए। यह लेन-देन बिना किसी बैंक रिकॉर्ड या चेक के हुआ, जिसे ब्लैक मनी की सीधी एंट्री बताया जा रहा है। डॉ. बेड़ा का दावा है कि यही नकद राशि M/s Tarasan Properties & Developers की एक इमारत के निर्माण में लगाई गई। इस तरह अवैध नकदी को निर्माण कार्य में लगाकर उसे वैध निवेश का रूप देने का आरोप है।
इन आरोपों के बाद रांची में रियल एस्टेट सेक्टर को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। डॉ. बेड़ा का कहना है कि शहर में प्रॉपर्टी का कारोबार अब सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि काले धन को खपाने का जरिया बनता जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि शिपिज त्रिवेदी इस नेटवर्क का अहम कड़ी हैं, जबकि विनय चौबे जैसे प्रभावशाली लोग इसके सबसे बड़े लाभार्थियों में शामिल बताए जा रहे हैं। विनय चौबे की भूमिका को लेकर उठे सवाल प्रशासनिक और राजनीतिक भ्रष्टाचार की ओर भी इशारा कर रहे हैं। जांच एजेंसियों के सामने अब यह बड़ा सवाल है कि सरकारी पद और प्रभाव का इस्तेमाल कर कितनी ऐसी संपत्तियां खड़ी की गईं, जिनका कोई आधिकारिक रिकॉर्ड मौजूद नहीं है। फिलहाल यह मामला जांच के दायरे में बताया जा रहा है। आने वाले दिनों में जांच एजेंसियों की कार्रवाई से यह साफ हो सकेगा कि रांची के रियल एस्टेट में काले धन के इस कथित नेटवर्क की जड़ें कितनी गहरी हैं।


