गिरिडीह: पारसनाथ पहाड़ स्थित आदिवासी संथाल समाज की सर्वोच्च आस्था के प्रतीक मरांग बुरू के संरक्षण को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। मरांग बुरू संघर्ष मोर्चा और मरांग बुरू संस्थान ने संयुक्त बयान जारी कर मरांग बुरू सांवता सुसार बैसी से जुड़े कुछ लोगों के बयानों का कड़ा खंडन किया है। मोर्चा ने आरोप लगाया कि कुछ लोग पुरखों की विरासत और आदिवासियों के पारंपरिक अधिकारों की रक्षा के लिए चलाए जा रहे आंदोलन को दिग्भ्रमित करने का प्रयास कर रहे हैं।
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बयान में कहा गया कि मरांग बुरू की रक्षा हेतु जिला, राज्य, राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जन आंदोलन चलाया जा रहा है, जिसका उद्देश्य आदिवासी समाज की धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक पहचान और पारंपरिक अधिकारों की सुरक्षा है।मोर्चा का आरोप है कि मरांग बुरू सांवता सुसार बैसी से जुड़े कुछ लोगों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आंदोलन को लेकर भ्रामक बातें कहीं। संगठन ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि आदिवासी समाज में फूट डालने की किसी भी कोशिश को स्वीकार नहीं किया जाएगा। मोर्चा और संस्थान ने अपने ऊपर लगाए गए आरोपों को भी पूरी तरह निराधार बताया।
संगठन का दावा है कि आंदोलन में पारसनाथ मौजा के 24 टोलों के प्रतिनिधियों के साथ जिला, राज्य, देश और विदेश में रह रहे आदिवासी समाज के माझी, परगना, नायके, पराणिक, जोगवा, समाजसेवी एवं बुद्धिजीवी शामिल हैं। बयान में कहा गया कि मरांग बुरू संथाल आदिवासी समाज की आस्था और पुरखों की विरासत का प्रतीक है। इसके संरक्षण के लिए केंद्र तथा राज्य सरकार से आवश्यक और ठोस कदम उठाने की मांग की गई है। मोर्चा, संस्थान एवं आदिवासी समाज ने मरांग बुरू की रक्षा के लिए पूरी प्रतिबद्धता जताई है।
बयान जारी करने वालों में महावीर मुर्मू, बिरजू मरांडी, सुनील मुर्मू, सुधीर बास्के, इतवारी किस्कू, चारो हेम्ब्रम, सुकरा बेसरा, शिवलाल सोरेन, चरकु मुर्मू, लखीराम सोरेन, महालाल मुर्मू, कोयल हेम्ब्रम, सुरेश हेम्ब्रम, दिलीप मुर्मू और सुशांत प्रसाद सोरेन शामिल हैं।

