Tuesday, September 22, 2026

करम गीत : पुरखों की आवाज और लोकस्मृति की धड़कन

डाॅ. दिनेश कुमार दिनमणि

करम की आत्मा को बचाने की चुनौती लोकपर्व केवल कैलेंडर की किसी तारीख पर लौटकर आने वाला उत्सव नहीं होता। वह किसी समुदाय की सामूहिक स्मृति का वह क्षण होता है, जब अतीत वर्तमान से आकर मिलता है; जब पुरखों की पदचाप वर्तमान पीढ़ी के बीच सुनाई पड़ती है और प्रकृति, मनुष्य तथा लोक जीवन के बीच के पुराने रिश्ते फिर से जीवंत हो उठते हैं। लोकपर्वों की यही जीवंतता उनके गीतों में सबसे अधिक दिखाई देती है। गीत न हों तो पर्व का रंग फीका पड़ जाता है, उसकी आत्मा जैसे कहीं खो जाती है। किसी लोकपर्व के गीतों की अपनी विशिष्ट पहचान होती है। उनकी धुन, लय, आरोह-अवरोह, शब्द-संयोजन और भावभूमि सुनते ही अनुभवी कान पहचान लेते हैं कि कौन-सा पर्व आ पहुँचा है। कई बार पर्व के आने की पहली सूचना किसी तिथि या घोषणा से नहीं, दूर से आती लोकधुन से मिलती है। कोई परिचित तान वातावरण में घुलती है और मन अनायास कह उठता है—करम आ गया है, सरहुल आ गया है, सोहराय आ गया है।

झारखंड की लोकसंस्कृति में गीतों का यही विशेष महत्त्व है। यहाँ पर्व और गीत एक-दूसरे के पर्याय जैसे लगते हैं।सोहराय हो, सरहुल हो या करम-जावा—गीतों के बिना इन पर्वों की कल्पना अधूरी है। अनुष्ठान अपनी जगह है, नृत्य अपनी जगह; लेकिन इन सबको प्राणवत्ता प्रदान करने वाला तत्व गीत ही है। और करम? करम तो जैसे गीत में जन्म लेता है, गीत में पलता है और गीत में ही अपनी पूर्णता प्राप्त करता है।

भादो की उमस भरी रातों में जब गाँव के अखरा में लोकस्वर गूंजते हैं, जब जावा के चारों ओर नाचती युवतियों और महिलाओं के कंठ से एक साथ लोकधुन फूटती है, तब लगता है जैसे मिट्टी के भीतर दबे सदियों पुराने स्वर फिर जाग उठे हों। अखरा बाँधने से लेकर जावा जगाने तक, जावा की सेवा से लेकर झूमर खेलने तक और अंततः जावा विसर्जन तक—करम की पूरी सांस्कृतिक यात्रा गीतों के सहारे आगे बढ़ती है। अवसर बदलता है तो गीत बदलता है, प्रसंग बदलता है तो उसकी धुन बदलती है; लेकिन लोकजीवन से उसका रिश्ता नहीं बदलता। करम गीतों की दुनिया अत्यंत विस्तृत है। उनमें केवल मनोरंजन नहीं, जीवन की पूरी कथा सांस लेती है।

कहीं आस्था का स्वर है, कहीं विश्वास का

प्रकृति है, ऋतु है, खेत है, जंगल है, नदी है, पहाड़ है; प्रेम है, विरह है, मिलन है; भाई-बहन का स्नेह है; श्रम की थकान है और उत्सव की उमंग भी। कहीं आस्था का स्वर है, कहीं विश्वास का; कहीं जीवन के संघर्ष की छाया है तो कहीं भविष्य के सुख का स्वप्न। इन गीतों को ध्यान से सुनें तो लगता है जैसे हमारे पुरखों ने अपने समय को कागज पर नहीं, कंठ में लिखकर हमारे लिए छोड़ दिया था। लिखित इतिहास की अपनी सीमाएं हैं। उसमें राजाओं, युद्धों और सत्ता के वृत्तांत मिलते हैं; लेकिन किसी समाज के साधारण मनुष्य की संवेदना, उसकी हँसी, उसका दुःख, उसकी आशा, प्रकृति के प्रति उसकी आत्मीयता और उसके जीवन-मूल्य अक्सर इतिहास के पन्नों से बाहर रह जाते हैं। लोकगीत उस मौन इतिहास को अपनी स्मृति में बचाए रखते हैं।

करम गीत भी हमारे सामुदायिक जीवन के ऐसे ही मौखिक दस्तावेज हैं। इन गीतों में हमारे पुरखों की प्रकृति-दृष्टि भी दिखाई देती है। प्रकृति उनके लिए केवल संसाधन नहीं थी; वह जीवन की सहचरी थी। पेड़-पौधे, नदी-पहाड़, खेत-खलिहान और ऋतुओं का परिवर्तन उनके जीवन के अभिन्न अंग थे। इसलिए उनके गीतों में प्रकृति केवल वर्णित नहीं होती, वह जीवंत होकर मनुष्य से संवाद करती हुई दिखाई देती है। लेकिन समय बदल रहा है। विज्ञान और तकनीक ने मनुष्य को अभूतपूर्व सुविधाएं दी हैं। संचार के साधनों ने दुनिया को हमारी हथेली पर ला दिया है।

मोबाइल की एक स्क्रीन पर दूर-दराज की दुनिया दिखाई देती है और कुछ ही क्षणों में कोई गीत हजारों लोगों तक पहुंच सकता है। यह परिवर्तन अपने आप में बुरा नहीं है। बल्कि यदि सही ढंग से उपयोग किया जाए तो यही तकनीक हमारी लोकसंस्कृति के संरक्षण का सबसे बड़ा माध्यम बन सकती है। आज करम के अवसर पर नए-नए गीत रचे जा रहे हैं। उन पर नृत्य के वीडियो तैयार हो रहे हैं और सोशल मीडिया के माध्यम से वे तेजी से फैल रहे हैं। नए समय के अनुभवों और संवेदनाओं को लेकर नए गीतों की रचना हो—इसका स्वागत होना चाहिए।

लोकसाहित्य ठहरा हुआ जल नहीं

लोकसाहित्य कभी ठहरा हुआ जल नहीं रहा; वह समय के साथ बहता हुआ जीवन है। नई पीढ़ी अपनी भाषा, अपनी संस्कृति और अपने सामाजिक अनुभवों से नए गीत रचे, यह लोक परंपरा की स्वाभाविक निरंतरता है। लेकिन प्रश्न तब उठता है, जब सृजन की जगह बाजार ले लेता है और संस्कृति की जगह केवल लोकप्रियता रह जाती है। व्यू लाइक की  दौड़ में जब फूहड़ता और सतही मनोरंजन परोसा जाता है, तब वह केवल एक खराब गीत नहीं होता; वह धीरे-धीरे हमारी सांस्कृतिक अभिरुचि को भी प्रभावित करता है। चिंता तब और बढ़ जाती है, जब ऐसे गीतों को करम गीत के नाम पर प्रस्तुत किया जाता है, जिनकी धुन, लय और गायन-परंपरा का करम-जावा अथवा भादो की पारंपरिक लोकधुनों से कोई संबंध नहीं होता। केवल गीत में ‘करम’ शब्द का इस्तेमाल कर देने से कोई गीत करम गीत नहीं बन जाता। करम गीत की अपनी लोकस्मृति है, अपनी धुन है, अपनी लय है और अपनी सांस्कृतिक आत्मा है।

अखरा रहेगा, जावा रहेगा, नृत्य भी होगा

झारखंड की लोकसंगीत परंपरा में ऋतु और अवसर के अनुरूप स्वर-लय की विशिष्ट परंपराएं विकसित हुई हैं। इसलिए नए सृजन के साथ परंपरा की पहचान और उसके संगीत-विन्यास का ज्ञान भी आवश्यक है। इधर डीजे संस्कृति का बढ़ता शोर भी हमारे पारंपरिक गीतों के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। तेज आवाज में बजते लोकप्रिय गीतों के बीच वह धीमा, सहज और आत्मीय लोक स्वर दबता जा रहा है, जिसे हमारे पुरखों ने सदियों की सामूहिक साधना से गढ़ा था। कभी गांव की रात में किसी घर से करम गीत की तान उठती थी तो दूसरा घर उसका स्वर पकड़ लेता था। धीरे-धीरे पूरा टोला उस सामूहिक गायन का हिस्सा बन जाता था। गीत केवल गाया नहीं जाता था—गीत के माध्यम से पूरा समुदाय एक-दूसरे से जुड़ता था।

आज वही सामूहिकता कहीं-कहीं डीजे के सामने खड़ी भीड़ में बदलती दिखाई देती है। नृत्य बचा है, लेकिन उसके साथ गाया जाने वाला गीत कम हो रहा है। पर्व बचा है, लेकिन उसकी पारंपरिक धुनें स्मृति से उतर रही हैं। उत्साह बचा है, लेकिन उसके भीतर की सांस्कृतिक चेतना कहीं कमजोर पड़ रही है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि नई पीढ़ी के अनेक बच्चे और युवा इन पारंपरिक गीतों को सीखने की आवश्यकता ही महसूस नहीं करते।

परिणाम यह है कि जिन गीतों को हमारी दादी-नानी, मां-बुआ और गांव की अनुभवी महिलाएं बिना किसी पुस्तक या लिखित पाठ के सहज स्मृति से गाती थीं, वे धीरे-धीरे स्मृति के अंतिम छोर पर पहुंच रहे हैं। किसी वृद्ध लोकगायिका के साथ यदि कोई गीत समाप्त हो जाता है तो केवल एक गीत नहीं मरता। उसके साथ एक धुन, एक प्रसंग, एक अनुभव, एक जीवन-दृष्टि और इतिहास का एक अनलिखा पन्ना भी खो जाता है। इसलिए आज प्रश्न केवल इतना नहीं है कि करम पर्व मनाया जा रहा है या नहीं। असली प्रश्न यह है कि करम मनाते हुए हम करम की आत्मा को बचा पा रहे हैं या नहीं। हमें नई पीढ़ी को नए गीतों से रोकना नहीं है, बल्कि उसे पुराने गीतों से जोड़ना है।

हमें आधुनिक तकनीक का विरोध नहीं करना है, बल्कि उसी तकनीक को लोकसंस्कृति के संरक्षण का माध्यम बनाना है। गांव-गांव जाकर पारंपरिक करम गीतों का संकलन हो। वृद्ध गायकों और गायिकाओं की आवाज रिकॉर्ड की जाए। गीतों का लिप्यांकन और दस्तावेजीकरण किया जाए। उनके अर्थ, प्रसंग, धुन और गायन-परंपरा को सुरक्षित रखा जाए। विद्यालयों और महाविद्यालयों में लोकगीत-लोकनृत्य की परंपरा को सांस्कृतिक गतिविधियों से जोड़ा जाए। सरकार, विश्वविद्यालय, सांस्कृतिक संस्थाएं और समाज के संवेदनशील लोग मिलकर इस दिशा में गंभीर पहल कर सकते हैं।

यदि आज हम इन गीतों को बचाने के लिए नहीं जागे तो कल हमारे पास उनके बारे में बताने के लिए केवल इतना रह जाएगा कि कभी हमारे पुरखे ऐसे गीत गाया करते थे। इससे बड़ी सांस्कृतिक विडंबना और क्या होगी कि करम का पर्व रहेगा, अखरा रहेगा, जावा रहेगा, नृत्य भी होगा—लेकिन वे गीत नहीं रहेंगे, जिनमें हमारे पुरखों की आवाज धड़कती थी। करम गीतों को बचाना केवल लोकगीतों को बचाना नहीं है। यह अपनी स्मृति को बचाना है। अपनी जड़ों को बचाना है।

अपनी सांस्कृतिक पहचान को बचाना है। आइए, इस करम पर डीजे के शोर के बीच कभी कुछ क्षण मौन भी हों। उस मौन में शायद हमें दूर कहीं से आती कोई पुरानी लोकधुन सुनाई दे—हमारे पुरखों की आवाज, जो आज भी हमें पुकार रही है। उसे सुनना होगा। उसे सीखना होगा। उसे अगली पीढ़ी तक पहुंचाना होगा। क्योंकि जब तक हमारे लोकगीत जीवित हैं, तब तक हमारी लोकस्मृति जीवित है। और जब तक हमारी लोकस्मृति जीवित है, तब तक हमारे पुरखे भी हमारे बीच जीवित हैं।

(लेखक रांची विवि के जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग में अध्यापन करते हैं।)

spot_img

एयर नाऊ स्पेशल

Big Breaking News: एक करोड़ का इनामी नक्सली मिशिर...

रांची: झारखंड पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों को नक्सल विरोधी अभियान में बड़ी सफलता मिली है. प्रतिबंधित भाकपा (माओवादी) के सेंट्रल कमेटी सदस्य और...
- Advertisement -spot_img

सोशल मीडिया

25,000FansLike
40,000FollowersFollow
500FollowersFollow
113,000SubscribersSubscribe
- Advertisement -spot_img

ट्रेंडिंग ख़बर