रांची : अपने स्कूल की नर्स से छेड़छाड़ व उत्पीड़न के आरोपों के तहत जमानत रद्द किए जाने वाले पूर्व प्राचार्य मनोज कुमार सिन्हा के खिलाफ दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है। इसके साथ ही कोर्ट ने उन्हें एक सप्ताह के भीतर निचली अदालत में आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है।
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मामला क्या है
2012–2022 के बीच रांची स्थित DAV कपिलदेव स्कूल में प्राचार्य रहे मनोज कुमार सिन्हा पर 2022 में यौन शोषण का आरोप सामने आया। स्कूल की नर्स ने अपनी शिकायत में कहा था कि प्राचार्य ने ब्लड प्रेशर जांच का झांसा देकर उसके साथ अभद्र व्यवहार किया, अश्लील वीडियो भेजे, वीडियो कॉल पर अनुचित बातें कीं, और काम के बदले धमकियां दी। इस पर पुलिस ने एफआईआर दर्ज की और सिंह निलंबित हुए। उसके बाद आरोपी फरार हो गए थे, लेकिन कुछ दिनों बाद पुलिस ने उन्हें जमशेदपुर से गिरफ्तार किया। शुरुआती सुनवाई में झारखंड हाई कोर्ट ने उन्हें जमानत दी थी। लेकिन बाद में, 20 जून 2025 को कोर्ट ने उनकी जमानत रद्द कर दी।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
मनोज सिन्हा ने सुप्रीम कोर्ट में झारखंड हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा संकेत है कि जमानत का दुरुपयोग हुआ है। इसलिए याचिका पर हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह आदेश ट्रायल (मुख्य मुकदमे) को प्रभावित नहीं करेगा। साथ ही, उन्होंने कहा कि शिकायतकर्ता की सुरक्षा और सफाई से मामले की सुनवाई होनी चाहिए। इसके साथ ही न्यायालय ने मनोज सिन्हा को एक सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया।
अब आगे क्या होगा?
पूर्व प्राचार्य को निर्देश मिला है कि वह सात दिनों में निचली अदालत में आत्मसमर्पण करें। अदालत ने यह भी कहा है कि इससे ट्रायल प्रक्रिया पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। मतलब मुकदमे की तारीख जल्द तय होगी, और जांच-सुनवाई जारी रहेगी। अगर आरोपी आत्मसमर्पण नहीं करते हैं, तो अदालत सख्त कदम उठा सकती है।
कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला यह साफ संकेत देता है कि अस्पताल, स्कूल या अन्य संस्थानों के वरिष्ठ अधिकारी, चाहे उनका पद कितनी भी ऊंची हो कानून के सामने बराबर हैं। यह फैसला पीड़ितों के लिए एक सकारात्मक संदेश है कि जब तक सच्चाई सामने नहीं आती, आरोपी को राहत नहीं मिलेगी।


