डेस्क : केरल के अलाप्पुझा नॉर्थ से एक दिल छू लेनी वाली कहानी सामने आई है। यहां बुजुर्ग महिलाएं डिप्रेशन और खालीपन से लड़ने के लिए अपनी जिंदगी की नई शुरूआत कर रही हैं। वुमेन फॉर सोशल मेटामॉफोंसिस से जुड़ी ये महिलाएं अब डांसर, गायक, लेखक और पॉटकास्टर बन रही है। उनका कहना है कि इस बदलाव ने उनकी जिंदगी में इतना सकारात्क असर डाला कि कई महिलाओं ने डिप्रेशन की दवाएं तक छोड़ दीं।
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शौक और जुनून को दी प्राथमिकता
इन महिलाओं के मुताबिक, उम्र के इस पड़ाव पर वो खुद को फिर से खोज रहीं हैं। घर परिवार, बच्चों की परवरिश और पति की जिम्मेंदारियों में जीवन बिताने के बाद अब उन्होंने अपने शौक और जुनून को जीना शुरू किया है। इस ग्रुप से जुड़कर उन्हें एक-दूसरे का सहारा मिला, जिससे वो मानसिक रूप से मजबूत हुईं और आत्मविश्वास लौटा।
WSM की कोऑर्डिनेटर ऐनीस फ्रांसिस बताती हैं कि ज्यादातर महिलाओं ने अपनी पूरी जिंदगी दूसरों की सेवा में लगा दी। रिटायरमेंट के बाद जब खालीपन आया तो डिप्रेशन ने घेर लिया। ऐसे में यह ग्रुप उनके लिए नई उम्मीद बनकर आया, जहां वे अपने अनुभव साझा करती हैं और एक-दूसरे से सीखती हैं।
ग्रुप की सदस्य वाली महिला कहती हैं कि कई पढ़ी-लिखी महिलाएं चारदीवारी के भीतर बिना वेतन की हाउसमेड बनकर रह गई थीं। लेकिन WSM से जुड़ने के बाद वे अपने भीतर के कलाकार को पहचान पाईं और अब गाने जैसे शौक पूरे कर रही हैं। महिलाएं सोलो ट्रैवलिंग, लेखन और पॉडकास्टिंग में भी रुचि ले रही हैं।
जिंदगी जीने की कोई उम्र नहीं
भारत में महिलाओं में डिप्रेशन की स्थिति गंभीर है। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च की रिपोर्ट के अनुसार 17-23% कामकाजी महिलाएं मीडियम से गंभीर डिप्रेशन से जूझ रही हैं। 50 साल से अधिक उम्र की महिलाओं में यह दर 21% से ज्यादा है। ऐसे में अलाप्पुझा की ये महिलाएं न सिर्फ खुद के लिए बल्कि समाज के लिए भी एक मजबूत संदेश दे रही हैं कि जिंदगी जीने के लिए कोई उम्र नहीं होती।


