बिहार : बिहार की सियासत में इस बार एक नई हलचल देखने को मिल रही है। एक बार फिर ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) चर्चा में है। पार्टी ने ऐलान किया है कि वह आने वाले विधानसभा चुनाव में 32 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी।
ओवैसी और अख्तरुल इमान की रणनीति
पार्टी के नेता असदुद्दीन ओवैसी और बिहार के प्रदेश अध्यक्ष अख्तरुल इमान का कहना है कि वे राज्य में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहते हैं और समान विचारधारा वाली पार्टियों के साथ मिलकर तीसरे मोर्चे की संभावना पर भी विचार कर रहे हैं।
बी टीम का टैग
अख्तरुल इमान ने कहा कि AIMIM अब किसी पार्टी की “बी टीम” नहीं है, बल्कि अपनी अलग पहचान के साथ मैदान में उतरेगी। उन्होंने बताया कि इन 32 सीटों में से 19 सीटों पर महागठबंधन के विधायक, खासकर RJD के हैं। यानी AIMIM इस बार सीधे तौर पर RJD को चुनौती देने जा रही है।
सीमांचल पर फोकस
AIMIM का मुख्य ध्यान उन इलाकों पर है जहाँ मुस्लिम आबादी ज्यादा है और पार्टी का जनाधार मजबूत है। इनमें सीमांचल क्षेत्र सबसे अहम है —
किशनगंज: 4 सीटें
पूर्णिया: 3 सीटें
कटिहार: 5 सीटें
अररिया: 3 सीटें
इसके अलावा गया, दरभंगा, पूर्वी चंपारण, मधेपुरा और भागलपुर जैसे जिलों में भी पार्टी अपने उम्मीदवार उतारने की तैयारी में है।
2015 में विधानसभा चुनाव
एआईएमआईएम ने पहली बार 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव में अपनी किस्मत आजमाई थी. उस वक्त पार्टी ने सीमांचल की छह सीटों पर उम्मीदवार उतारे, लेकिन कोई भी सीट नहीं जीत पाई. किशनगंज की कोचाधामन सीट से पार्टी के उम्मीदवार और वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष अख्तरुल ईमान को लगभग 37 हजार वोट मिले. यह कुल डाले गए मतों का करीब 26 प्रतिशत था.
पिछली बार की सफलता और झटका
2020 के विधानसभा चुनाव में AIMIM ने BSP और RLSP के साथ गठबंधन किया था और 5 सीटें जीतकर सबको चौंका दिया था।
लेकिन जल्द ही 4 विधायक RJD में शामिल हो गए, जिससे AIMIM के पास केवल एक विधायक बचा। इसे “4 सीटों का मामला” कहा गया।
इस बार मजबूत संगठन
इस बार पार्टी ने तय किया है कि ऐसी गलती दोबारा नहीं होगी। हर विधानसभा क्षेत्र में स्थानीय नेताओं, युवाओं और महिला कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी दी गई है ताकि संगठन जमीनी स्तर पर मजबूत हो सके।
AIMIM की नीति
राजनीतिक जानकारों के अनुसार, बिहार में मुस्लिम आबादी करीब 17 प्रतिशत है, लेकिन विधानसभा में उनका प्रतिनिधित्व कम है। AIMIM इसे एक मुख्य मुद्दा बना रही है और कहती है कि वह सिर्फ मुस्लिमों की नहीं, बल्कि गरीबों, पिछड़ों और दलितों की आवाज बनेगी।
महागठबंधन से अलग
AIMIM नेताओं के मुताबिक, 2020 में उन्होंने लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव को महागठबंधन में शामिल होने की इच्छा जताई थी, लेकिन जवाब नहीं मिला।
अब पार्टी ने तय किया है कि वह अपने दम पर लड़ेगी और जनता के सामने एक नए विकल्प के रूप में जाएगी।
24 सीटों से बढ़ाकर 32 सीटों की रणनीति
पहले AIMIM ने लगभग 24 सीटों पर चुनाव लड़ने की योजना बनाई थी, लेकिन अब इसे बढ़ाकर 32 सीटें कर दिया गया है। यह पार्टी के बढ़ते आत्मविश्वास और विस्तारित जनाधार को दिखाता है।
चुनावी तारीखें
बिहार विधानसभा चुनाव की तारीखें तय हो चुकी हैं —
पहला चरण: 6 नवंबर
दूसरा चरण: 11 नवंबर
मतगणना: 14 नवंबर
नया विकल्प देने की कोशिश
अख्तरुल इमान ने कहा कि बिहार के लोग अब दो बड़े गठबंधनों से थक चुके हैं और एक नए राजनीतिक विकल्प की तलाश में हैं। अगर तीसरा मोर्चा बनता है, तो AIMIM उसमें अहम भूमिका निभाएगी।
सीमांचल में AIMIM
सीमांचल क्षेत्र की जनता में AIMIM का प्रभाव अभी भी देखा जा सकता है। पिछली बार किशनगंज में पार्टी की जीत ने साबित किया था कि सही उम्मीदवार और ईमानदार मुद्दे जनता को आकर्षित कर सकते हैं।
तीसरी ताकत बनने की कोशिश
कुल मिलाकर AIMIM अब बिहार की राजनीति में खुद को “तीसरी ताकत” के रूप में पेश करने की कोशिश में है। पार्टी को विश्वास है कि सीमांचल के साथ-साथ अन्य जिलों में भी लोग उसे एक मजबूत विकल्प के रूप में देखेंगे।


