रांची: झारखंड सरकार के पूर्व मंत्री मंत्री व झारखंड कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष बंधु तिर्की ने चुनाव आयोग में आंतरिक मतभेद और SIR को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला मानी जाने वाली संस्था भारत निर्वाचन आयोग आज अपने आंतरिक विवादों के कारण संदेह के घेरे में आ गई है। इंडियन एक्सप्रेस की जांच रिपोर्ट के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार तथा दो अन्य चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी के बीच SIR को लेकर गहरे मतभेद सामने आए है।
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उन्होंने कहा कि पिछले 10 महीनों में दोनों आयुक्तों ने 14 बार औपचारिक आपत्ति दर्ज की है, जिनमें एक ही दिन में चार आपत्तियां तक शामिल हैं। आपत्तियां मुख्य रुप से चार बिंदुओं पर केंद्रित हैं। पहला, फॉर्म-6 में SIR से संबंधित प्रश्न जोड़कर वैधानिक फॉर्म में बदलाव करना। विवेक जोशी ने स्पष्ट किया था कि Registration of Electors Rules, 1960 में संशोधन के बिना ऐसा बदलाव अवैध है। सुखबीर सिंह संधू ने इसे “अनधिकृत और अवैध” करार दिया।
दूसरा, मतदाता डेटा और आईटी सिस्टम पर नियंत्रण केंद्रीकृत करने का निर्णय, जिस पर दोनों आयुक्तों ने 14 बार मुख्य चुनाव आयुक्त के फैसलो पर Note of Dissent लिखा है। तीसरा, पश्चिम बंगाल सहित कई राज्यों में नाम हटाने-बहाल करने तथा अपील प्रक्रिया की पारदर्शिता। चौथा, तीन सदस्यीय आयोग की सामूहिक निर्णय प्रक्रिया का उल्लंघन। SIR की शुरुआत जून 2025 में बिहार से हुई। 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की ड्राफ्ट सूची से 13 करोड़ से अधिक नाम बाहर किए गए। यह सरासर “वोट चोरी है, जबकि पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओ.पी. रावत और एस.वाई. कुरैशी ने भी फॉर्म-6 के बदलाव को अवैध माना है।
चुनाव आयोग के सूत्रों का दावा है कि सभी निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए और आपत्तियां केवल प्रक्रिया का हिस्सा थीं। कानून के अनुसार मतभेद की स्थिति में बहुमत लागू होता है, परंतु दो आयुक्तों द्वारा बार-बार लिखित Note of Dissent देने के बाद भी “सर्वसम्मति” का दावा संस्था की आंतरिक लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल खड़ा करता है।
यह विवाद मात्र व्यक्तिगत मतभेद नहीं, बल्कि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता और अनुच्छेद 324 के मूल उद्देश्य पर प्रहार है। नियुक्ति प्रक्रिया पहले से विवादित होने तथा आंतरिक दरारों के बीच मतदाता सूची की शुद्धता का दावा कमजोर पड़ता है। आयोग को तत्काल सभी आंतरिक दस्तावेज सार्वजनिक करने, आपत्तियों का पूर्ण विवरण देने और पारदर्शी जांच कराने की आवश्यकता है। तीनों आयुक्तों का सामूहिक दायित्व है कि वे संस्था की गरिमा और लोकतंत्र की नींव को सुरक्षित रखें। अन्यथा मतदाता सूची पर उठे सवाल चुनाव प्रक्रिया को महज औपचारिकता बना देंगे।


