Saturday, September 12, 2026

हरतालिका तीज 2026: जानें व्रत की पूरी विधि व इससे जुड़ी पौराणिक कथा, शुभ मुहूर्त और पूजा का महत्व

डेस्क: हरतालिका तीज हिंदू धर्म के प्रमुख व्रत-त्योहारों में से एक है, जो भगवान शिव और माता पार्वती के पवित्र मिलन को समर्पित है। यह व्रत भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को रखा जाता है। खासतौर पर विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, सुखी दांपत्य जीवन और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना से यह व्रत करती हैं। वहीं, अविवाहित कन्याएं भी मनचाहा जीवनसाथी पाने की इच्छा से हरतालिका तीज का व्रत रखती हैं। इस दिन महिलाएं माता पार्वती और भगवान शिव की श्रद्धापूर्वक पूजा करती हैं।

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हरतालिका तीज की पौराणिक कथा

पौराणिक मान्यता के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठिन तपस्या की थी। उनके पिता हिमवान माता पार्वती का विवाह भगवान विष्णु से करना चाहते थे, लेकिन पार्वती भगवान शिव को ही अपना पति मान चुकी थीं। तब उनकी सखी उन्हें एक घने वन में ले गईं, जहां माता पार्वती ने भगवान शिव की प्राप्ति के लिए कठोर तप और उपवास किया। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार करने का वरदान दिया। इसी कथा से हरतालिका तीज के नाम और व्रत की परंपरा जुड़ी मानी जाती है। ‘हरतालिका’ शब्द को सखी द्वारा माता पार्वती को अपने साथ ले जाने की कथा से जोड़ा जाता है।

हरतालिका तीज 2026 कब है?

साल 2026 में हरतालिका तीज का व्रत 14 सितंबर, सोमवार को रखा जाएगा। पंचांग के अनुसार भाद्रपद शुक्ल तृतीया तिथि 13 सितंबर की सुबह शुरू होकर 14 सितंबर की सुबह तक रहेगी। पूजा का सही मुहूर्त शहर और स्थानीय पंचांग के अनुसार कुछ मिनट अलग हो सकता है। उदाहरण के लिए, दिल्ली में 14 सितंबर को प्रातःकालीन पूजा का समय लगभग सुबह 6:05 बजे से 7:06 बजे तक बताया गया है। इसलिए पूजा के लिए अपने शहर के स्थानीय पंचांग के अनुसार मुहूर्त देखना उचित माना जाता है।

व्रत कैसे रखा जाता है?

हरतालिका तीज का व्रत कठिन व्रतों में माना जाता है और कई महिलाएं इस दिन निर्जला व्रत रखती हैं, यानी अन्न और जल दोनों का त्याग करती हैं। हालांकि स्वास्थ्य संबंधी समस्या, गर्भावस्था या किसी अन्य कारण से निर्जला व्रत रखना संभव न हो तो अपनी शारीरिक स्थिति के अनुसार व्रत का पालन करना चाहिए। सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं और महिलाएं पारंपरिक रूप से सोलह श्रृंगार करती हैं। इसके बाद भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की पूजा की जाती है। कई स्थानों पर मिट्टी या बालू से शिव-पार्वती की प्रतिमा बनाकर उनका पूजन करने की परंपरा भी है।

पूजा विधि और सामग्री

पूजा के दौरान भगवान शिव और माता पार्वती को फूल, अक्षत, रोली, सिंदूर, धूप, दीप, फल, मिठाई और अन्य पूजन सामग्री अर्पित की जाती है। माता पार्वती को सुहाग की सामग्री जैसे सिंदूर, चूड़ी, बिंदी, मेहंदी, चुनरी और अन्य श्रृंगार सामग्री अर्पित करने की परंपरा कई क्षेत्रों में प्रचलित है। पूजा के दौरान हरतालिका तीज की कथा सुनी या पढ़ी जाती है और शिव-पार्वती की आरती की जाती है। व्रत रखने वाली महिलाएं दिनभर भगवान शिव और माता पार्वती का ध्यान करती हैं तथा परिवार के सुख, शांति और समृद्धि की प्रार्थना करती हैं।

सोलह श्रृंगार और परंपराएं

हरतालिका तीज केवल धार्मिक व्रत ही नहीं बल्कि महिलाओं के लिए उत्साह और सौंदर्य से जुड़ा पारंपरिक पर्व भी है। इस दिन महिलाएं हरे, लाल, पीले या अन्य पारंपरिक रंगों के वस्त्र पहनकर सोलह श्रृंगार करती हैं। कई जगहों पर महिलाएं एक-दूसरे को सुहाग की सामग्री भेंट करती हैं और सामूहिक रूप से तीज की कथा एवं भजन-कीर्तन करती हैं। झूला झूलना, मेहंदी लगाना और लोकगीत गाना भी कई क्षेत्रों की पारंपरिक तीज संस्कृति का हिस्सा है। उत्तर भारत के साथ-साथ राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड और अन्य राज्यों में यह पर्व अलग-अलग स्थानीय परंपराओं के साथ श्रद्धा और उत्साह से मनाया जाता है।

धार्मिक और सामाजिक संदेश

हरतालिका तीज की परंपरा श्रद्धा, संकल्प, प्रेम और दांपत्य जीवन में आपसी समर्पण का संदेश देती है। धार्मिक मान्यता है कि माता पार्वती की तरह सच्ची श्रद्धा और निष्ठा से भगवान शिव की आराधना करने से वैवाहिक जीवन में सुख-शांति और सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है। यह पर्व महिलाओं को अपनी आस्था और पारिवारिक परंपराओं से जोड़ने के साथ-साथ परिवार में प्रेम और एकता का संदेश भी देता है। हरतालिका तीज के अवसर पर सबसे महत्वपूर्ण बात श्रद्धा और भक्ति है; व्रत के कठोर नियमों का पालन अपनी शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर ही करना चाहिए।

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एयर नाऊ स्पेशल

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