Lifestyle Desk: एक समय था जब किसी भी बच्चे से पूछा जाता था कि बड़े होकर क्या बनोगे, तो जवाब सीधा होता था. डॉक्टर, इंजीनियर, साइंटिस्ट या पायलट. लेकिन आज का बच्चा लैब या हॉस्पिटल नहीं, बल्कि कैमरा और मोबाइल स्क्रीन में अपना फ्यूचर देख रहा है और सच कहें तो ये बदलाव छोटा नहीं है.
हाल ही में हुई एक स्टडी में सामने आया कि 60% से ज्यादा बच्चे अब सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर बनना चाहते हैं. यानी यूट्यूब, इंस्टाग्राम या शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म पर अपना नाम बनाना उनका गोल है. और ये सिर्फ बड़े बच्चों तक सीमित नहीं है, 7–8 साल के छोटे बच्चे भी यही सोच रहे हैं. जब उनसे पूछा गया कि ये आइडिया कहां से आया, तो जवाब साफ था कि उन्होंने इसे सोशल मीडिया पर देखा.
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अब सवाल ये है कि आखिर ऐसा क्या दिख रहा है बच्चों को. सीधी बात है जो दिखता है वही दिमाग में बैठ जाता है. बच्चों को वहां लोग वीडियो बनाकर फेमस होते दिखते हैं, कम उम्र में पहचान मिलती दिखती है, ब्रांड्स के साथ काम करके पैसे कमाते लोग नजर आते हैं और एक ऐसी लाइफस्टाइल दिखती है जो काफी ग्लैमरस लगती है. ये सब देखकर उन्हें लगता है कि यही सबसे आसान रास्ता है.
साल 2018 में बच्चों की पहली पसंद डॉक्टर, टीचर और इंजीनियर जैसे प्रोफेशन हुआ करते थे. यानी तब ध्यान एक सेटल करियर पर था, लेकिन अब फोकस तेजी से बदलकर जल्दी सफलता पाने पर आ गया है. यह बदलाव सिर्फ विदेशों तक सीमित नहीं है, भारत में भी तेजी से देखा जा रहा है. करीब 37% जेन अल्फा बच्चे इन्फ्लुएंसर बनने का सपना देख रहे हैं.
16 साल से कम उम्र के कंटेंट क्रिएटर्स की संख्या तेजी से बढ़ रही है और हजारों बच्चे पहले से ही सोशल मीडिया पर एक्टिव हैं. मोबाइल और इंटरनेट की आसान पहुंच ने उनकी सोच को पूरी तरह बदल दिया है. अब रोल मॉडल भी बदल गए हैं. पहले बच्चे किसी टीचर या खिलाड़ी से इंस्पायर होते थे, लेकिन अब वे यूट्यूबर्स और रील क्रिएटर्स को फॉलो करते हैं.
अब बात आती है कि ये सही है या गलत. देखो इन्फ्लुएंसर बनना गलत नहीं है. ये भी एक करियर है और इसमें स्कोप भी है. लेकिन दिक्कत तब होती है जब बच्चे सिर्फ इसका चमक वाला हिस्सा देखते हैं. उन्हें ये समझ नहीं आता कि कंटेंट बनाना आसान नहीं होता, हर वीडियो वायरल नहीं होता, लगातार मेहनत करनी पड़ती है और स्टेबल इनकम भी तुरंत नहीं मिलती.
यही वजह है कि यहां पैरेंट्स और टीचर्स का रोल सबसे जरूरी हो जाता है. बच्चों को रोकना नहीं है, बल्कि उन्हें सही तस्वीर दिखानी है. उन्हें समझाना जरूरी है कि हर फील्ड में मेहनत लगती है, हर करियर की अपनी वैल्यू होती है और सबसे जरूरी यह है कि वे वही चुनें जिसमें उनकी असली रुचि हो. आखिर में बात सीधी है कि ट्रेंड बदलना गलत नहीं है, लेकिन बिना समझे किसी भी चीज के पीछे भागना सही नहीं है. बच्चों को सपने देखने दो, बस ये ध्यान रहे कि वो सपने रियलिटी से जुड़े हों, सिर्फ स्क्रीन की दुनिया से नहीं. क्योंकि असली सक्सेस वही होती है जो लंबे समय तक टिके.

