झारखंड में बिजली बनाने और इस्तेमाल करने वाली कंपनियों के लिए अब नियम और सख्त होने वाले हैं. झारखंड राज्य विद्युत नियामक आयोग ने बिजली के उत्पादन और खपत में मनमानी रोकने के लिए नए नियमों का ड्राफ्ट तैयार किया है. इसका मकसद बिजली के ग्रिड को सुरक्षित रखना और बिजली की सप्लाई को संतुलित बनाए रखना है.
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नए नियमों के तहत अगर कोई कंपनी तय शेड्यूल से ज्यादा बिजली बनाएगी या जरूरत से ज्यादा बिजली खींचेगी, तो उसे इसके लिए ज्यादा पैसे देने पड़ सकते हैं.
आखिर इसकी जरूरत क्यों पड़ी?
बिजली के ग्रिड में हर समय उत्पादन और खपत के बीच संतुलन जरूरी होता है. अगर अचानक कोई कंपनी ज्यादा बिजली खींच ले या कोई बिजली बनाने वाली कंपनी तय मात्रा से ज्यादा या कम बिजली सप्लाई करे, तो ग्रिड पर दबाव बढ़ सकता है.
इसी को रोकने के लिए आयोग ने डेविएशन सेटलमेंट मैकेनिज्म लाने का प्रस्ताव रखा है. आसान भाषा में कहें तो जितनी बिजली के लिए पहले से योजना बनाई गई है, उससे ज्यादा या कम बिजली लेने या देने पर हिसाब-किताब और चार्ज लगेगा.
बिजली बनाने वालों के लिए क्या नियम होंगे?
सामान्य बिजली उत्पादकों के लिए एक सीमा तय की गई है. वे तय शेड्यूल से 10 फीसदी या 100 मेगावाट, जो भी कम हो, तक ही अलग मात्रा में बिजली दे सकेंगे.अगर इससे ज्यादा अंतर हुआ तो उन्हें अतिरिक्त चार्ज देना पड़ सकता है.
हालांकि नदी के बहाव पर निर्भर हाइड्रो पावर और कचरे से बिजली बनाने वाले प्लांट के लिए अलग नियम होंगे. इसकी वजह यह है कि इन प्लांट में बिजली का उत्पादन कई बार प्राकृतिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है.
ज्यादा बिजली ली तो देना पड़ सकता है दोगुना पैसा
इस नियम का असर बिजली खरीदने वालों पर भी पड़ेगा. इसमें बिजली वितरण कंपनियां, ओपन एक्सेस से बिजली लेने वाले उपभोक्ता और कैप्टिव पावर प्लांट शामिल हैं.अगर कोई खरीदार तय मात्रा से ज्यादा बिजली खींचता है तो उसे सामान्य कीमत का 200 फीसदी तक भुगतान करना पड़ सकता है.वहीं अगर कोई तय मात्रा से कम बिजली लेता है और नियमों के मुताबिक तय सीमा में रहता है, तो उसे प्रोत्साहन या रिफंड मिल सकता है.
छह टाइम-ब्लॉक में बदलना होगा साइन
डेविएशन यानी तय मात्रा से ज्यादा या कम बिजली लेने-देने के मामले में एक और नियम रखा गया है.हर छह टाइम-ब्लॉक के अंदर बिजली लेने या देने वाली इकाई को अपने डेविएशन का साइन बदलना होगा. यानी अगर वह लगातार ज्यादा बिजली ले रही है या लगातार कम बिजली दे रही है, तो उसे अपनी स्थिति बदलनी होगी.अगर ऐसा नहीं किया गया तो 20 फीसदी अतिरिक्त चार्ज लगाया जा सकता है.
सात दिन में करना होगा भुगतान
- एसएलडीसी यानी स्टेट लोड डिस्पैच सेंटर हर सात दिन का डेविएशन चार्ज स्टेटमेंट तैयार करेगा.
- जिस कंपनी या संस्था पर पैसा बनेगा, उसे 7 दिनों के अंदर भुगतान करना होगा.
- अगर भुगतान में देरी हुई तो हर दिन 0.04 फीसदी की दर से अतिरिक्त चार्ज देना होगा.
पैसा नहीं दिया तो बैंक गारंटी या एलसी
अगर कोई कंपनी बार-बार भुगतान नहीं करती है, तो उसे अपनी औसत साप्ताहिक देनदारी के 110 फीसदी के बराबर बैंक गारंटी या लेटर ऑफ क्रेडिट देना होगा.अगर इसके बाद भी समय पर भुगतान नहीं किया गया तो एसएलडीसी एलसी को भुना सकता है.
आपदा या ग्रिड फेल होने पर राहत
नए नियमों में प्राकृतिक आपदा और ग्रिड फेल होने जैसी स्थिति के लिए भी राहत का प्रावधान है.
अगर ऐसी वजह से बिजली की सप्लाई प्रभावित होती है तो उस समय के लिए डेविएशन चार्ज नहीं लिया जाएगा. उस दौरान वास्तविक बिजली उत्पादन और खपत को ही शेड्यूल माना जाएगा.
कुल मिलाकर, नए नियमों का मकसद साफ है. बिजली बनाने और इस्तेमाल करने वाली कंपनियों को तय योजना के मुताबिक चलना होगा.शेड्यूल से ज्यादा हटने पर जेब ढीली करनी पड़ेगी और बार-बार नियम तोड़ने पर आर्थिक कार्रवाई भी हो सकती है. इससे राज्य के बिजली ग्रिड को ज्यादा स्थिर और सुरक्षित रखने की कोशिश की जाएगी.

