रांची: झारखंड की सबसे प्रतिष्ठित प्रशासनिक परीक्षाओं की साख को तार-तार कर देने वाले एक बहुत बड़े और संगठित फर्जीवाड़े का सीआईडी ने पर्दाफाश किया है. झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) की परीक्षाओं में हुई धांधलियों की परतें सीआईडी की गिरफ्त में आए मुख्य आरोपी अभय तिवारी के बयानों से एक-एक कर उधड़ रही हैं. सीआईडी पूछताछ में हुए इन सनसनीखेज खुलासों के बाद राज्य के प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में हड़कंप मच गया है. जांच में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि इस पूरे काले कारोबार और साज़िश की पटकथा किसी गुप्त ठिकाने पर नहीं, बल्कि राजधानी रांची के नामी होटलों में रची जाती थी.
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सीआईडी की जांच के अनुसार, मुख्य आरोपी अभय तिवारी ने अपने साथियों के साथ मिलकर पहले बाज़ार में अपनी पैठ बनाई और फिर रांची के स्टेशन रोड स्थित ‘स्वीट एंड स्पाइस’ तथा ‘प्रकाश रेसिडेंसी’ जैसे होटलों को अपनी आपराधिक गतिविधियों का मुख्य केंद्र बनाया. इन होटलों के कमरों में बैठकर योग्य और मेहनतकश युवाओं के भविष्य का सौदा किया जाता था. होटलों की चकाचौंध के पीछे करोड़ों रुपये के काले धन के लेन-देन, फर्जी सूचियों को अंतिम रूप देने और पूरी रणनीति तैयार करने का काम होता था. इस सिंडिकेट की जड़ें परीक्षा संचालन से लेकर प्रशासनिक तंत्र के उच्च पदों तक फैली हुई थीं.स्वीट एंड स्पाइस से जेएसआर एजेंसी और टीडीपीएल तक का नेटवर्क भ्रष्टाचार के इस खेल की शुरुआत साधारण तरीके से हुई थी, जिसने आगे चलकर राज्य के लाखों युवाओं के सपनों को चकनाचूर कर दिया.
अभय का बिजनेस पार्टनर
अभय ने सबसे पहले एक बिजनेस पार्टनर के साथ मिलकर होटल व्यवसाय में कदम रखा. इसके बाद उसने अपनी खुद की मैनपावर सप्लाई करने वाली फर्म ‘जेएसआर एजेंसी’ खड़ी की. इसी एजेंसी और होटल नेटवर्क के ज़रिये उसकी पहुंच परीक्षा आयोजित कराने वाली एजेंसी ‘टीडीपीएल’ के शीर्ष अधिकारियों तक हो गई. दिल्ली, कोडरमा और झारखंड के विभिन्न जिलों में फैले इस गिरोह ने टीडीपीएल के ज़िम्मेदार अधिकारियों के साथ मिलकर परीक्षा प्रणाली को पूरी तरह से खरीद-फरोख्त का बाज़ार बना दिया. इस साठगांठ में अभय को भारी-भरकम कमीशन मिलता था.
19 में केवल 1 अभ्यर्थी फेल
सीआईडी के समक्ष अभय तिवारी द्वारा किए गए खुलासों ने राज्य की पूरी चयन प्रक्रिया की साख पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. फॉरेस्ट रेंज ऑफिसर (FRO) और असिस्टेंट कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट (ACF) जैसे प्रतिष्ठित पदों की खुलेआम बोलियां लगाई गईं इस सेटिंग का आलम यह था कि कुल 19 उम्मीदवारों को सफल घोषित किया गया और सिर्फ एक अभ्यर्थी ही असफल हो सका. जांच में यह खतरनाक तथ्य भी सामने आया कि सफल होने वाले कुछ अभ्यर्थी खुद भी इस अवैध सिंडिकेट के लिए सक्रिय दलाल के रूप में काम कर रहे थे.
इंटरव्यू पैनल की फिक्सिंग
11वीं से 13वीं जेपीएससी परीक्षा में नियमों को ताक पर रखकर पदों की बंदरबांट की गई थी. पूछताछ में तत्कालीन चेयरमैन एल. ख्यांग्ते, सदस्य अजीता भट्टाचार्य, जमाल अहमद और डॉ. अनिमा हांसदा की भूमिका बेहद संदिग्ध पाई गई है. नामकुम के एक व्यक्ति के माध्यम से आयोग के शीर्ष अधिकारियों और टीडीपीएल के निदेशक तक पहुंच बनाई गई थी. जिस अभ्यर्थी की जिस आयोग सदस्य से पहले से ‘गुप्त सेटिंग’ हो चुकी होती थी, उस अभ्यर्थी को योजनाबद्ध तरीके से उसी विशेष इंटरव्यू पैनल के सामने भेजा जाता था, ताकि उसे मनमाने और अधिक अंक दिए जा सकें. इसके अलावा, बाल विकास परियोजना अधिकारी (सीडीपीओ) परीक्षा में भी प्रति अभ्यर्थी 10 लाख रुपये तक वसूले जाने की बात स्वीकार की गई है.
दबाव में जारी हुआ था रिज़ल्ट
सिंडिकेट के दबाव और प्रभाव का अंदाज़ा तत्कालीन उप परीक्षा नियंत्रक श्वेता गुप्ता के बयान से लगाया जा सकता है. श्वेता गुप्ता ने सीआईडी को दिए अपने आधिकारिक बयान में खुलासा किया कि, तत्कालीन अध्यक्ष एल. ख्यांगते द्वारा उन पर जबरन दबाव बनाकर परीक्षा परिणाम जारी करवाया गया था. वह इस परिणाम को जारी करने के पक्ष में बिल्कुल नहीं थीं. तत्कालीन अध्यक्ष ने उनसे स्पष्ट कहा था कि प्रीलिम्स और मेंस दोनों के अंक उनके पास उपलब्ध हैं, इसलिए परिणाम तुरंत घोषित किए जाएं.
बिहार से दिल्ली तक फैला जाल
इस सिंडिकेट को चलाने के लिए झारखंड, बिहार और दिल्ली तक दलालों की एक पूरी फ़ौज तैनात थी. सानंद प्रकाश और रवि मास्टर प्रतियोगी अभ्यर्थियों को ढूंढने से लेकर उनसे पैसों की वसूली की कमान संभालते थे.पटना, गिरिडीह, बोकारो, हजारीबाग और दिल्ली तक फैले इस नेटवर्क में इमरान, राजेश सिंह, शंकर और सुनील जैसे दलालों के नाम सामने आए हैं, जो लगातार अभ्यर्थियों से संपर्क कर उनसे मोटी रकम ऐंठ रहे थे.

