Thursday, November 5, 2026

परिसीमन पर पूर्व मंत्री बंधु तिर्की का बयान, आदिवासी अधिकारों पर संकट, “विभाजन न हो, भौगोलिक एकता बनी रहे”

रांची : आगामी परिसीमन को लेकर झारखंड के आदिवासी समाज में चिंता और आक्रोश की लहर देखी जा रही है. पूर्व विधायक एवं आदिवासी नेता बंधु तिर्की ने इस मुद्दे पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि परिसीमन प्रक्रिया के दौरान आदिवासियों का विभाजन नहीं होना चाहिए और उनकी भौगोलिक एकता हर हाल में बनी रहनी चाहिए. यह सिर्फ सीटों के आंकड़े का खेल नहीं है, बल्कि आदिवासी समाज के अस्तित्व और उनके संवैधानिक अधिकारों का सवाल है.

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साधारण शब्दों में परिसीमन का अर्थ “संसदीय और विधानसभा सीटों का पुनर्गठन (फिर से बंटवारा)”है. देश में हर 10 से 20 साल के अंतराल पर बढ़ती और घटती जनसंख्या के आधार पर लोकसभा और विधानसभा की सीमाओं और सीटों का निर्धारण किया जाता है. वर्ष 2026 के बाद देश भर में पुनः परिसीमन की प्रक्रिया प्रस्तावित है, जिसे लेकर झारखंड के अनुसूचित जनजाति बाहुल्य क्षेत्रों में चिंता गहराने लगी है.

2002 का अनुभव और विरोध का इतिहास

इतिहास को याद दिलाते हुए बताया गया कि वर्ष 2002 में भी झारखंड में आदिवासी आरक्षित सीटों को कम करने का प्रयास किया गया था. विधानसभा में एसटी सीटों को 28 से घटाकर 22 करने की योजना थी लोकसभा में एसटी सीटों को पांच से घटाकर चार करने का प्रस्ताव था. इस फैसले के खिलाफ आदिवासी समाज सड़कों पर उतर आया था. जनता का कहना था कि हम पहले से ही विस्थापन और पलायन का दंश झेल रहे हैं, अब हमारी राजनीतिक आवाज को भी दबाने की कोशिश की जा रही है. भारी जनविरोध और आंदोलन के बाद सरकार को अपना फैसला वापस लेना पड़ा और धारा 108B (Section 108B) लागू करके झारखंड में सीटों की कटौती पर रोक लगाई गई.

2026 के बाद पुनः खतरा क्यों?

  • – यदि आगामी परिसीमन का आधार केवल जनसंख्या रखा गया, तो झारखंड के आदिवासी इलाकों को भारी नुकसान हो सकता है. इसके मुख्य तीन कारण बताए गए हैं.
  • – पलायन: रोजगार की तलाश में आदिवासी बहुल इलाकों से बड़ी संख्या में लोग राज्यों से बाहर चले जाते हैं.
  • – कम आबादी घनत्व: जंगल और पहाड़ी क्षेत्रों में प्राकृतिक रूप से जनसंख्या घनत्व शहरों की तुलना में कम होता है
  • – विस्थापन: बड़ी खदानों और बांध परियोजनाओं के कारण कई आदिवासी गांव पूरी तरह उजड़ चुके हैं.
  • आदिवासी समाज की चार प्रमुख मांगें:
  • – कटौती पर पूर्ण रोक: वर्तमान में मौजूद 28 विधानसभा और 5 लोकसभा अनुसूचित जनजाति सीटें किसी भी परिस्थिति में कम नहीं होनी चाहिए.
  • – समानुपातिक वृद्धि: यदि कुल विधानसभा सीटें 81 से बढ़कर 126 होती हैं, तो एसटी सीटों को भी 28 से बढ़ाकर 44 किया जाना चाहिए, ताकि प्रतिशत में कोई कमी न आए.
  • – समग्र मापदंड: परिसीमन तय करते समय सिर्फ जनसंख्या को आधार न मानकर जंगल, पहाड़, विस्थापन और पांचवीं अनुसूची के प्रावधानों का ध्यान रखा जाए.
  • – कानूनी व संवैधानिक गारंटी: संविधान में यह प्रावधान दर्ज किया जाए कि परिसीमन के नाम पर आदिवासी आरक्षित सीटें कभी कम नहीं की जाएंगी.

एयर नाऊ स्पेशल

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