रांची : झारखंड में कई आंगनवाड़ी सेविकाएं हर दिन इस डर में जी रही हैं कि अगर डिजिटल लक्ष्य पूरे नहीं हुए तो उनकी नौकरी चली जाएगी। दूसरी ओर, जब डिजिटल प्रणाली काम नहीं करती, तो ग्रामीणों और सेविकाओं के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो रही है। यह डर और टकराव कोई एक दिन की बात नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की हकीकत बन चुकी है- जिसे केंद्र सरकार ने पोषण ट्रैकर के माध्यम से खड़ा किया है।
Highlights:
हालात इन दिनों और भी बदतर हो गए हैं- कई सेविकाओं को बूथ लेवल कार्यकर्ता (BLO) के तौर पर विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) का भारी-भरकम काम भी थोप दिया गया है, वह भी मामूली मानदेय पर। पहले से ही पोषण ट्रैकर, e-KYC और चेहरा पहचान प्रणाली (FRS) के बोझ तले दबी सेविकाएं अब SIR के दोहरे शोषण का शिकार होने पर मजबूर हैं। यह तस्वीर भोजन का अधिकार अभियान, झारखंड द्वारा किए गए एक महत्वपूर्ण सर्वेक्षण से सामने आई है।
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राज्य के 9 जिलों का अध्ययन

भोजन का अधिकार अभियान ने नवंबर-दिसंबर 2025 में राज्य के 9 जिलों- लोहरदगा, बोकारो, दुमका, खूंटी, पश्चिमी सिंहभूम, कोडरमा, पलामू, लातेहार और गिरिडीह के 15 प्रखंडों में 106 आंगनवाड़ी केंद्रों का दौरा किया और सेविकाओं से आमने-सामने बातचीत की।
सर्वेक्षण का मकसद यह पता लगाना था कि वास्तव में पोषण कार्यक्रम की क्या स्थिति है- क्या अंडा और टीएचआर योजना लोगों तक पहुंच रहा है, ई-केवाईसी और चेहरा पहचान प्रणाली (FRS) जैसी डिजिटल प्रणालियां काम कर रही हैं या नहीं, और सेविकाओं को अपने दैनिक काम में किन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
सर्वेक्षण के दौरान सामने आए महत्वपूर्ण तथ्य
1. अंडा वितरण योजना: राज्य की नीति है कि सप्ताह में छह दिन अंडे दिए जाएं, लेकिन केवल 43% सेविकाओं ने ही माना कि वे छह दिन अंडे दे रही हैं। वास्तविक स्थिति इससे ज्यादा खराब होगी। सरकार प्रति अंडा 6 रुपये देती है, जबकि बाजार में दाम कहीं अधिक है। अधिकांश सेविकाएं अपनी जेब से अंडे खरीदती हैं और प्रतिपूर्ति का महीनों इंतजार करती हैं। 2-3 महीने या उससे अधिक की देरी के कारण कई केंद्रों अंडे देना बंद कर देती हैं। पर यह महत्वपूर्ण है कि 97% सेविकाओं ने कहा कि अंडे मिलने पर बच्चों की उपस्थिति बढ़ जाती है।

2. e-KYC: सर्वेक्षण के समय तक केवल 56.1% लाभार्थियों का ही e-KYC पूरा हो पाया था, जबकि केंद्र सरकार का लक्ष्य 1 जुलाई 2025 तक 100% कवरेज का था। 53% सेविकाओं ने बताया कि e-KYC में 10 मिनट से अधिक समय लगता है या प्रक्रिया विफल हो जाती है। 92% सेविकाओं ने OTP देरी की शिकायत की। पुराने बायोमेट्रिक्स या आधार में गलत विवरण के कारण कई पात्र महिलाएं और बच्चे आंगनवाड़ी सेवाओं से वंचित हो रहे हैं।
3. THR और चेहरा पहचान प्रणाली (FRS): सर्वेक्षण के समय 87% केंद्रों ने बताया कि पिछले महीने (अक्टूबर या नवम्बर) कोई THR वितरण नहीं हुआ। यह संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि प्रशासनिक विफलता थी- आपूर्ति टेंडर का नवीनीकरण ही नहीं हुआ था। फिर भी कुछ क्षेत्रों में पोषण ट्रैकर पर वितरण की झूठी प्रविष्टियां दर्ज होती रहीं।
FRS को लेकर स्थिति बेहद चिंताजनक:
● 86% सेविकाओं ने कमजोर नेटवर्क कनेक्टिविटी की शिकायत की।
● 41.5% सेविकाओं ने बताया कि कैमरा अक्सर चेहरा नहीं पहचान पाता।
● 73.6% सेविकाओं का मानना है कि FRS से उनका काम और मुश्किल हो गया है।
● 52% सेविकाएं FRS बंद करने के पक्ष में हैं।
● 30% से अधिक सेविकाएं बताती हैं कि FRS काम न करने पर वे THR वितरण ही नहीं कर पातीं- यानी छोटे बच्चे और गर्भवती/स्तनपान कराने वाली महिलाएं तकनीकी विफलता की वजह से पोषण से वंचित रह जाते हैं।
● 84% सेविकाओं ने बताया कि FRS अधूरा रहने पर उन्हें अधिकारियों के दबाव का सामना करना पड़ता है।
575 गांव मोबाइल नेटवर्क से वंचित

RTI से प्राप्त जानकारी के अनुसार झारखंड के 575 गांव आज भी किसी भी मोबाइल नेटवर्क या इंटरनेट सुविधा से वंचित हैं- और इन्हीं इलाकों में पोषण की सबसे ज्यादा जरूरत है। ऐसे में अभियान की मांग है कि सरकार बिना देरी इन अव्यवस्थाओं को दूर करने के लिए आवश्यक कदम उठाए। अभियान ने चेतावनी दी कि यदि समय रहते सरकार ने ठोस कदम नहीं उठाए, तो इसका सीधा असर महिलाओं और बच्चों के पोषण और स्वास्थ्य पर पड़ेगा।
1. THR आपूर्ति बहाल करें और भविष्य में बाधा न आए यह सुनिश्चित करें: टेंडर समाप्त होने से पहले नवीनीकृत किए जाएं। जितने महीनों का THR नहीं दिया गया उसकी भरपाई की जाए।
2. डिजिटल सत्यापन विफलता के कारण THR रोकना बंद करें: सभी अधिकारियों को तत्काल और स्पष्ट निर्देश जारी किया जाए कि FRS या e-KYC विफल होने के कारण THR नहीं रोका जा सकता।
3. FRS तुरंत बंद करें: इस सर्वेक्षण के साक्ष्य स्पष्ट हैं। FRS 94% केंद्रों में समस्या पैदा कर रहा है, यह तकनीकी रूप से अविश्वसनीय है, और इसने लोगो के भोजन के अधिकार को कमजोर किया है। इसे तुरंत बंद किया जाए। FRS लागू होने से पहले रजिस्टर आधारित वितरण काम कर रहा था और उसे बहाल किया जाना चाहिए। डिजिटल तकनीक का उपयोग तभी किया जाना चाहिए जब वह उपयुक्त, उपयोगी और विश्वसनीय हो।

4. अंडा वितरण के लिए सेविकाओं को अग्रिम भुगतान करें: सेविकाओं से यह अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए कि वे अपने पैसे से अंडे खरीदें और प्रतिपूर्ति का इंतजार करें। सरकार को वितरण से पहले सेविकाओं को दो महीने का अग्रिम भुगतान करना चाहिए, अंडों की वास्तविक बाजार दर पर – न कि मौजूदा सरकारी दर 6 रूपये प्रति अंडे पर। यह अग्रिम भुगतान हर महीने बिना देरी के जारी रहना चाहिए ताकि भुगतान विफलता के कारण अंडा वितरण कभी बाधित न हो। मध्याहन भोजन के राशन के लिए भी समान भुगतान व्यवस्था होनी चाहिए।
5. तकनीकी विफलताओं के लिए सेविकाओं को जिम्मेदार ठहराना बंद करें: डिजिटल सत्यापन विफलताओं के लिए सेविकाओं पर कोई भी कार्रवाई या दबाव तुरंत बंद किया जाए।
6. आंगनवाड़ी केंद्रों की स्थिति ठीक करें: इस सर्वेक्षण जर्जर भवनों में चल रहे केंद्र मिले, जहां पानी या शौचालय तक नहीं है। ऐसे हर केंद्र को बिना और देरी किए एक उचित भवन, स्वच्छ पेयजल, एक शौचालय और बिजली उपलब्ध कराई जाए।


