Wednesday, July 29, 2026

चतरा एयर एंबुलेंस हादसा: जांच रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा, रडार से गायब होने से पहले क्या हुआ था? पढ़ें पूरी डीटेल 

राँची: झारखंड के चतरा में 23 फरवरी को हुए दर्दनाक एयर एम्बुलेंस हादसे को लेकर एयरक्राफ्ट एक्सीडेंट इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो (AAIB) की प्रारंभिक रिपोर्ट सामने आ गई है। इस हादसे में मरीज और उनके परिजनों सहित कुल 7 लोगों की मौत हुई थी। रिपोर्ट में ऐसे कई तकनीकी पहलुओं का खुलासा हुआ है, जिन्होंने विमान की सुरक्षा और निगरानी पर बड़े सवालिया निशान लगा दिए हैं।

बिना ब्लैक बॉक्स उड़ रहा था विमान

एएआईबी की जांच में सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह आया है कि रेडबर्ड के बीचक्राफ्ट C-90 विमान में कोई ब्लैक बॉक्स था ही नहीं। विमान में न तो कॉकपिट वॉइस रिकॉर्डर (CVR) था और न ही फ्लाइट डेटा रिकॉर्डर (FDR)। इसका मतलब यह है कि हादसे से ठीक पहले पायलटों के बीच क्या बात हुई, इंजन ने कब जवाब दिया या कॉकपिट में क्या हलचल थी, इसका कोई तकनीकी सबूत अब मौजूद नहीं है। मौजूदा नियमों की आड़ में इस श्रेणी के विमानों को इन जीवनरक्षक उपकरणों से छूट मिली हुई थी, जो आज जांच में सबसे बड़ी बाधा बन गई है।

इमरजेंसी लोकेटर ट्रांसमीटर भी फेल

हादसे के बाद जब रेस्क्यू टीम को विमान की लोकेशन ढूंढनी थी, तब विमान का इमरजेंसी लोकेटर ट्रांसमीटर (ELT) पूरी तरह नाकाम रहा। क्रैश के समय इसे खुद-ब-खुद सक्रिय होकर सिग्नल भेजने चाहिए थे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। आलम यह था कि प्रशासन को मलबे तक पहुँचने के लिए तकनीक पर नहीं, बल्कि स्थानीय ग्रामीणों की सूचना पर निर्भर रहना पड़ा। अगर ग्रामीण न होते, तो शायद यह मलबा ढूंढने में और भी वक्त लगता।

रडार से ओझल होने के वो आखिरी 23 मिनट

विमान ने रांची से उड़ान भरी और सब कुछ सामान्य लग रहा था। ठीक 23 मिनट बाद पायलट ने कोलकाता ATC से 14,000 फीट की ऊंचाई (Flight Level 140) पर जाने की अनुमति मांगी। अनुमति मिली भी, लेकिन उसके बाद सन्नाटा पसर गया। विमान रडार से गायब हो गया। उन चंद सेकंडों में विमान के साथ क्या हुआ, यह अब भी एक अनसुलझी पहेली है।

एक महीने पहले मिला था फिटनेस सर्टिफिकेट

रिपोर्ट ने विमान के रखरखाव पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। हादसे से महज एक महीने पहले, 20 जनवरी 2026 को ही इस विमान का अंतिम निरीक्षण हुआ था और इसे उड़ने के लिए पूरी तरह फिट बताया गया था। अब सवाल ये है कि जो विमान 30 दिन पहले तकनीकी रूप से दुरुस्त था, उसमें अचानक ऐसी क्या खराबी आई कि वह सीधा मौत के मलबे में तब्दील हो गया?

क्या अब सिर्फ मलबे से निकलेगा सच?

चूंकि ब्लैक बॉक्स मौजूद नहीं है, इसलिए अब जांचकर्ताओं के पास केवल फॉरेंसिक साक्ष्य और विमान का बिखरा हुआ मलबा ही एकमात्र सहारा है। सात परिवारों की चीखें आज भी इंसाफ मांग रही हैं और यह रिपोर्ट इशारा कर रही है कि कहीं न कहीं सुरक्षा नियमों की ढील ने इस हादसे की जमीन तैयार की थी। अब सवाल है क्या एयर एंबुलेंस जैसे संवेदनशील ऑपरेशन के लिए ब्लैक बॉक्स की अनिवार्यता पर सरकार फिर से विचार करेगी? या फिर हम अगले किसी हादसे और ऐसी ही एक रिपोर्ट का इंतजार करेंगे?

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