Saturday, October 31, 2026

झारखंड में नक्सलियों के खिलाफ चले ऑपरेशन ब्लैक थंडर में गिरफ्तार आरोपी 14 साल बाद सबूत के अभाव में बरी

राँची: झारखंड हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में सोमा तारकोट को हत्या, दंगा और नक्सली गतिविधियों जैसे गंभीर आरोपों से पूरी तरह बरी कर दिया है। अदालत ने निचली अदालत द्वारा दी गई सजा और दोषसिद्धि को रद्द करते हुए सोमा को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया है।

क्या था मामला?

यह मामला साल 2010 का है, जब पश्चिम सिंहभूम जिले के घने सारंडा जंगलों में नक्सलियों के खिलाफ पुलिस ने ‘ऑपरेशन ब्लैक थंडर’ चलाया था। 26 सितंबर 2010 को पुलिस ने माओवादियों के एक कथित प्रशिक्षण शिविर पर छापा मारा था। इस दौरान हुई भीषण मुठभेड़ में कोबरा बल का एक जवान शहीद हो गया था। पुलिस का दावा था कि सोमा तारकोट उस मुठभेड़ में शामिल था और उसके पास से भारी मात्रा में विस्फोटक और आपत्तिजनक सामान बरामद किया गया था। चाईबासा की निचली अदालत ने अगस्त-सितंबर 2018 में सोमा को हत्या, हत्या के प्रयास और सरकारी काम में बाधा डालने का दोषी मानते हुए सजा सुनाई थी। जिसके बाद साल 2018 में दोषी ठहराए जाने के बाद सोमा ने हाई कोर्ट में अपील दायर की थी।

सिर्फ अनुमान पर नहीं दी जा सकती सजा- हाई कोर्ट  

न्यायमूर्ति रंगन मुखोपाध्याय और न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने इस मामले की गहन सुनवाई की। अदालत ने पाया कि सोमा के खिलाफ लगाए गए आरोपों को साबित करने के लिए पुलिस के पास कोई ठोस आधार नहीं था। हाई कोर्ट ने फैसले के दौरान कहा कि पुलिस ने दावा किया था कि सोमा के पास से विस्फोटक मिले थे, लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि उन जब्त सामानों को कभी अदालत में पेश ही नहीं किया गया।
कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला जिससे यह साबित हो सके कि सोमा तारकोट किसी नक्सली संगठन (जैसे MCC) का सदस्य था। इस मामले के अन्य सह-आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए पहले ही बरी किया जा चुका था। हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले पर टिप्पणी करते हुए कहा कि वह फैसला अनुमान और अंदाज पर आधारित था, जबकि कानून तथ्यों और सबूतों की मांग करता है। हाई कोर्ट ने अब सोमा को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया है। इसके साथ ही कोर्ट ने आदेश दिया कि यदि सोमा तारकोट किसी अन्य मामले में वांछित नहीं हैं, तो उन्हें तुरंत जेल से रिहा किया जाए।

14 साल का लंबा संघर्ष

सोमा तारकोट ने साल 2010 से लेकर अब तक एक लंबा कानूनी और मानसिक संघर्ष झेला है। 2018 में दोषी ठहराए जाने के बाद उन्होंने हाई कोर्ट में अपील दायर की थी। कोर्ट ने अब उनकी अपील स्वीकार करते हुए उन्हें सभी आरोपों से मुक्त कर दिया है। अदालत का यह आदेश उन लोगों के लिए एक बड़ी नजीर है जिन्हें अक्सर बिना पर्याप्त सबूतों के नक्सली बताकर जेलों में डाल दिया जाता है।

एयर नाऊ स्पेशल

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