रांची: झारखंड हाईकोर्ट में 100 प्रतिशत सीट महिलाओं के लिए आरक्षित करने के संबंध में उठे विवाद पर सुनवाई फिर से 18 मार्च को होगी। यह मामला महिला सुपरवाइजर की भर्ती से जुड़ा है, जिसमें प्रार्थी की ओर से याचिका दाखिल की गई थी।
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क्या है मामला?
जेएसएससी (Jharkhand Staff Selection Commission) ने बाल कल्याण विभाग में महिला सुपरवाइजर के 421 पदों के लिए विज्ञापन जारी किया था, जिसमें आवेदन केवल महिलाओं के लिए निर्धारित किया गया था। कुछ अभ्यर्थियों ने इस आरक्षण को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी और तर्क दिया था कि किसी पद पर 100 % आरक्षण देना संविधान के सिद्धांतों के खिलाफ है।
पहली सुनवाई और आगे की प्रक्रिया
बुधवार को मामले की सुनवाई झारखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एमएस सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ में हुई। सुनवाई के दौरान पक्षकारों के तर्क सुने गए और अगली सुनवाई 18 मार्च को दोपहर के लिए तय की गई है। सरकार की ओर से महाधिवक्ता राजीव रंजन ने बताया कि महिला सुपरवाइजर के पद को केवल महिलाओं के लिए इसलिए रखा गया है क्योंकि इस पद के कार्य विशेष रूप से महिलाओं से जुड़े समूह (जैसे गर्भवती महिला, नवजात शिशु को जन्म देने वाली महिला आदि) के लिए हैं और कई अन्य राज्यों में भी इसी तरह की व्यवस्था है। वहीं प्रार्थी पक्ष का कहना है कि भर्ती प्रक्रिया में किसी भी श्रेणी को 100 % आरक्षण देना संविधान के बराबरी के अधिकार के खिलाफ है।
अब क्या होगा?
अब हाईकोर्ट की अगली सुनवाई में दोनों पक्षों के तर्कों पर गहराई से विचार किया जाएगा और कोर्ट यह तय करेगी कि क्या किसी भी पद पर पूरी तरह से महिलाओं को आरक्षित करना संविधान के अनुरूप है या नहीं। यह मामला देश में आरक्षण की सीमा और संवैधानिक दायरे को लेकर अहम चुनौती बन सकता है। अधिक जानकारी के लिए यह याद रखना जरूरी है कि संविधान की धारा 16 और इससे जुड़े सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों में सीधे 100 % आरक्षण देना सीमित माना गया है। ऐसे मामलों में न्यायालय का रुख यह निर्धारित करता है कि सेल्फ-गवर्निंग संस्थानों और सरकारी भर्ती में किस हद तक आरक्षण लागू हो सकता है।



