उत्तर प्रदेश: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में परिवार अदालत, चित्रकूट द्वारा दिए गए गुजारा भत्ता के आदेश पर रोक लगा दी है। यह आदेश उस मामले में दिया गया, जिसमें कथित पत्नी अपने पहले पति से बिना तलाक लिए दूसरे व्यक्ति के साथ रह रही थी। यह आदेश न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह ने संतोष कुमार द्वारा दाखिल आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया गया। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता जयदीप त्रिपाठी और अजय कुमार पांडेय ने अदालत में पक्ष रखा। याचिकाकर्ता के अधिवक्ताओं ने दलील दी कि विपक्षी रन्नो, संतोष कुमार की वैध पत्नी नहीं है, इसलिए उसे गुजारा भत्ता दिए जाने का परिवार अदालत का आदेश विधि विरुद्ध है। अधिवक्ताओं के अनुसार, रन्नो की शादी पहले शारदा प्रसाद से हुई थी और उसने उस विवाह से कोर्ट के माध्यम से तलाक नहीं लिया। इसके बावजूद वह संतोष कुमार के साथ पत्नी के रूप में रहने लगी।
Highlights:
हाई कोर्ट ने इस मामले में विपक्षी महिला और बच्ची को नोटिस जारी करते हुए तीन सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर अगली सुनवाई 11 मार्च 2026 को होगी।
गुजारा भत्ता की अर्जी दाखिल
बताया गया कि रन्नो ने धारा 125 सीआरपीसी के तहत परिवार अदालत में गुजारा भत्ता की अर्जी दाखिल की थी। इस पर परिवार अदालत के प्रधान न्यायाधीश ने रन्नो को 2000 रुपये प्रतिमाह और उसकी बच्ची को 1000 रुपये प्रतिमाह गुजारा भत्ता देने का आदेश पारित किया था। इसी आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ताओं का कहना था कि विपक्षी ने स्वयं स्वीकार किया है कि विवाह में सप्तपदी नहीं हुई थी, जो हिंदू विवाह की एक आवश्यक रस्म है। ऐसे में उसे वैध पत्नी नहीं माना जा सकता और वह गुजारा भत्ता पाने की हकदार नहीं है। हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता की दलीलों को प्रथम दृष्टया विचारणीय मानते हुए परिवार अदालत के आदेश के अमल पर रोक लगा दी है। साथ ही, विपक्षी महिला और बच्ची से इस याचिका पर तीन सप्ताह के भीतर जवाब तलब किया है। मामले की विस्तृत सुनवाई अब 11 मार्च को होगी।


