झारखंड : झारखंड विधानसभा में विधानसभा अध्यक्ष रहे आलमगीर आलम और इंदर सिंह नामधारी के कार्यकाल में लगभग 592 पदों पर हुई नियुक्ति मामले में सीबीआई जांच पर लगी रोक जारी रहेगी. सुप्रीम कोर्ट में इस मामले को लेकर मंगलवार को हुई सुनवाई में कोर्ट ने सीबीआई की ओर से जांच पर लगी रोक को हटाने को लेकर दायर याचिका खारिज हो गई. इस याचिका की सुनवाई आज मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और न्यायाधीश के विनोद चंद्रन की पीठ में हुई.
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सुनवाई के दौरान विधानसभा की ओर से कपिल सिब्बल ने पक्ष रखते हुए कहा कि यह मामला राजनीति से प्रेरित है. जब भी इस तरह का मामला सामने आता है. सीबीआई बीच में चली आती है. विधानसभा की ओर से दायर याचिका पूर्व में ही सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई को लेकर स्वीकृत हो चुकी है. उधर सीबीआई की ओर से कोर्ट में मौजूद अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने कपिल सिब्बल की बातों का विरोध किया. उन्होंने कहा कि नियुक्ति में गड़बड़ी हुई है. यह गंभीर मामला है. जांच जारी रखने की अनुमति दी जाये.
2024 में लगी थी रोक
बता दें कि झारखंड हाई कोर्ट ने विधानसभा नियुक्ति घोटाले की सीबीआइ जांच करने का आदेश दिया था। इसके खिलाफ विधानसभा की ओर से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी। जिस पर सुनवाई करते हुए 14 नवंबर 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी थी। सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में हस्तक्षेप याचिका दाखिल कर झारखंड हाई कोर्ट के विधानसभा नियुक्ति घोटाले की सीबीआइ जांच के आदेश पर लगी रोक को हटाने का अनुरोध किया है। सीबीआइ की ओर से दाखिल याचिका में कहा गया है कि विधानसभा में नियुक्तियों के दौरान भ्रष्टाचार और पद के दुरुपयोग के आरोप लगाए गए थे।
2023 में हाईकोर्ट ने दिया था जांच का आदेश
इससे पहले झारखंड हाईकोर्ट ने 23 अक्तूबर 2023 को विधानसभा नियुक्ति घोटाले से जुड़ी दोनों न्यायिक आयोगों की रिपोर्ट और राज्यपाल द्वारा दिए गए निर्देश को ध्यान में रखते हुए सीबीआइ जांच का आदेश दिया था। सीबीआइ ने कहा है कि वह प्रारंभिक जांच कर रही थी। इसमें पहले सिर्फ इस बात की जांच की जाती है कि नियुक्ति प्रक्रिया में गड़बड़ी और भ्रष्टाचार के लगाए गए आरोप सही हैं या नहीं। लेकिन इस बीच जांच पर रोक लगा दी गई, जिसे हटाया जाना चाहिए।
598 पदों पर नियुक्तियों में हुई गड़बड़ियां
कहा जा रहा है कि झारखंड विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष इंदर सिंह नामधारी के कार्यकाल में विधानसभा में 274 पदों पर हुई नियुक्तियों में अनियमितता पायी गयी थी. तो वहीं बाद में आलमगीर आलम के कार्यकाल में भी 324 पदों पर हुई नियुक्तियों के दौरान भी बड़े पैमाने पर अनियमितता पायी गयी थी. इस मामले की जांच के लिए बने जज (रिटायर्ड) विक्रमादित्य आयोग ने इसके लिए तत्कालीन दोनों अध्यक्षों के खिलाफ कार्रवाई करने की अनुशंसा की थी. लेकिन जस्टिस एसजे मुखोपाध्याय आयोग ने इसे यह कहते हुए ख़ारिज कर दिया कि यह बिंदु विक्रमादित्य आयोग की कार्यसूची में शामिल नहीं था. इसलिए इसे अस्वीकार कर दिया जाना चाहिए.


