डेस्क: भगवान विश्वकर्मा को ब्रह्मांड का दिव्य वास्तुकार और शिल्प कला का जनक माना जाता है, और विश्वकर्मा पूजा उनके सृजन कौशल और सम्मान में हर साल कन्या संक्रांत 17 सितंबर की ग्रेगोरियन तिथि को मनायी जाती है. यह उत्सव प्रायः मुख्य तौर पर विश्वकर्मा के पांच पुत्रों मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी और देवज्ञ की संतानों द्वारा मनाई जाती है.
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इस दिन खास तौर पर कारीगर, इंजीनियर, शिल्पकार और तकनीकी काम से जुड़े लोग भगवान विश्वकर्मा की पूजा करते हैं और कार्यस्थल पर मशीनों व औजारों की पूजा कर भक्त भगवान से सुख-समृद्धि और काम में सफलता की कामना करते हैं. पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 7:58 बजे से दोपहर 12:40 बजे तक है. वहीं, अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:51 बजे से दोपहर 12:40 बजे तक रहेगा.
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पूजा की सरल विधि
सबसे पहले कार्यस्थल या घर के एक साफ कोने में चौकी रखें और उस पर पीला या लाल रंग का कपड़ा बिछाएं. फी उस चौकी पर भगवान विश्वकर्मा की तस्वीर या मूर्ति के साथ भगवान गणेश का चित्र भी स्थापित करें. इसके बाद तांबे या मिट्टी के कलश में जल भरकर उसमे आम के पत्ते डाल कर चौकी पर रखें. अपने सभी औजारों, मशीनों, हथियारों या कंप्यूटर-लैपटॉप पर रोली, अक्षत (पूजा का चावल) और पुष्प चढाने के बाद हाथ में अक्षत-फूल लेकर व्यापार में वृद्धि और सफलता की प्रार्थना करें और ‘ॐ श्री विश्वकर्मणे नमः’ या ‘ॐ श्रिष्टनया सर्वसिद्दाय विश्वकर्माय नमो नमः’ मंत्र का जाप करें. भगवान को फल, मिठाई का भोग लगाए और धूप-दीप अर्पित करें. अंत में कपूर जलाकर विश्वकर्मा भगवान की आरती करें और फिर प्रसाद बांटें.

