Friday, May 15, 2026

झारखंड हाई कोर्ट ने 8 साल में हिरासत में हुए 427 मौत और जांच में लापरवाही पर सरकार को लगाई फटकार, कहा- ये संवैधानिक तंत्र की विफलता

रांची: झारखंड में हिरासत में होने वाली मौतों और जांच में बरती जा रही लापरवाही के मामले में झारखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने सरकार की कार्य प्रणाली पर बेहद सख्त टिप्पणी की है। मुख्य न्यायाधीश एस एम सोनक एवं न्यायाधीश राजेश शंकर की खंडपीठ ने हिरासत में हुई मौतों की संख्या और उसकी जांच नहीं होने पर इसे संवैधानिक तंत्र की विफलता बताते हुए राज्य सरकार को जमकर फटकार लगाई है। दरअसल अदालत ने इस बात पर हैरानी जताई कि पिछले 8 सालों में राज्य में 427 हिरासत में मौतें हुईं, लेकिन उनकी जांच के नाम पर केवल खानापूर्ति की गई।

8 साल में आए 427 में से 262 मामलों की जांच पर सवाल

मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि सरकार ने कानून का उल्लंघन कर 427 में से 262 मामलों की जांच मजिस्ट्रेट के बजाय कार्यकारी मजिस्ट्रेट से कराया है। साथ ही अदालत ने कहा कि चौंकाने वाली बात यह है कि जांच उन अधिकारियों के द्वारा की गई जिनके पास इसका कानूनी अधिकार था ही नहीं, ऐसे में उनके जांच के आधार, मानक एवं रिपोर्ट वैध नहीं हो सकते। वहीं अदालत ने सख्त निर्देश जारी करते हुए कहा कि राज्य में CrPC 176(1-अ) और नए कानून 196(2) के तहत हिरासत या जेल में मौत, गायब होने या बलात्कार जैसे मामलों की जांच अनिवार्य रूप से केवल न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा ही कराना होगा।

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262 मामलों की जांच अवैध, फिर से करायें न्यायिक जांच – HC

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि कार्यकारी मजिस्ट्रेट जैसे एसडीएम या एडीएम की जांच को इसका विकल्प नहीं माना जा सकता। ऐसे मामलों में न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा की गई जांच ही वैध मानी जाएगी। इसके साथ ही अदालत ने पुराने मामलों की फिर से जांच करने का निर्देश जारी किया है। अदालत ने राज्य सरकार के इनकार के रवैया को खारिज करते हुए कई दिशा निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने कहा कि 2018 के बाद से जिन 262 मामलों की जांच कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने की थी उन सभी की नए सिरे से न्यायिक जांच की जाए। इसके लिए जिला जजों को 15 दिनों के भीतर मजिस्ट्रेट नामित करने का निर्देश दिया है। वहीं अदालत ने लापरवाही पर भी सख्त रवैया अपनाते हुए गृह सचिव और प्रधान जिला जजों से 6 माह के भीतर लापरवाही पर रिपोर्ट मांगी है। इसके साथ ही पूछा है कि आखिर कानून का उल्लंघन कर जांच क्यों ऐसे लोगों को दी गई जिन्हें उसका अधिकार था ही नहीं। अदालत ने इन मामलों से जुड़े सभी लोगों और अधिकारियों की पहचान करने और उन पर कार्रवाई कर अदालत को रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है। वहीं अदालत ने अब से होने वाले हिरासत में किसी भी अनहोनी घटना पर विशेष रूप से निर्देशित किया है कि किसी भी घटना और अनहोनी होने पर 24 घंटे के अंदर इसकी जानकारी राष्ट्रीय मानवअधिकार आयोग (NHRC) और जिला जज को देना अनिवार्य होगा।

डीएम और एसपी को सर्कुलर जारी करने का आदेश

अदालत ने सख्त रूप से मुख्य सचिव को निर्देश देते हुए कहा कि “सभी डीएम और एसपी को सर्कुलर जारी कर बताएं कि भविष्य में ऐसी किसी भी लापरवाही को कानून का जानबूझकर उल्लंघन माना जाएगा। क्योंकि पुलिस और प्रशासन अलग अलग भेष में एक ही है और शायद इसलिए संसद ने यह शक्ति कार्यपालिका से छीनकर न्यायपालिका को दी थी ताकि पुलिस और प्रशासन के बीच भाईचारे के रिश्तों के कारण जांच प्रभावित न हो, न्यायपालिका अपने कर्तव्यों का निर्माण बेहतर से करें यह भी जरूरी है।” अदालत में सर्वोच्च न्यायालय के नीलावती बेहरा केस का जिक्र करते हुए कहा कि हिरासत में मौजूद व्यक्ति की जीवन की रक्षा करना राज्य की सख्त जिम्मेदारी है जिसमें कोई बहाना नहीं नहीं चलेगा। मामले में झारखंड न्याय का अकादमी को 4 महीने के भीतर एक एसओपी (SOP) बनाने को कहा है ताकि नियमों के तहत जांच में कोई बाधा ना आ सके प्रक्रियाओं का पालन सही तरीके से हो पाए।

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