Saturday, September 26, 2026

पत्नी की हत्या मामले में हाईकोर्ट ने पति समेत दो आरोपियों को किया बरी

रांची: पत्नी की हत्या से जुड़े एक पुराने मामले में झारखंड हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने निचली अदालत द्वारा दी गई आजीवन कारावास की सजा को रद्द करते हुए दो आरोपियों को बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि मामले में ठोस और भरोसेमंद सबूत नहीं मिले, इसलिए आरोपियों को संदेह का लाभ दिया गया।

क्या है पूरा मामला

यह मामला साल 2000 का है। इसमें शत्रुघन प्रसाद डांगी की पत्नी उषा देवी की हत्या हुई थी। शुरुआत में इसे लूट और हत्या का मामला माना गया था, लेकिन बाद में जांच के दौरान पति पर ही पत्नी की हत्या की साजिश रचने का आरोप लगा। इस मामले में धानु भुइयां को भी सह-अभियुक्त बनाया गया था। निचली अदालत यानी हजारीबाग की ट्रायल कोर्ट ने दोनों आरोपियों को दोषी मानते हुए आईपीसी की धारा 302/34 के तहत आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।

हाईकोर्ट ने क्यों पलटा फैसला

झारखंड हाईकोर्ट की खंडपीठ, जिसमें न्यायमूर्ति रंगन मुखोपाध्याय और न्यायमूर्ति दीपक रोशन शामिल थे। उन्होंने मामले की सुनवाई के बाद अहम टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि मामले में कोई प्रत्यक्षदर्शी गवाह नहीं है और पूरा केस परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित था, जो पूरी तरह विश्वसनीय साबित नहीं हुआ। कोर्ट ने यह भी पाया कि सह-अभियुक्त के खिलाफ केवल कथित स्वीकारोक्ति बयान के अलावा कोई ठोस सबूत नहीं था। इसके अलावा जिस चाकू को हत्या का हथियार बताया गया था, उसे फोरेंसिक जांच के लिए नहीं भेजा गया और यह भी साबित नहीं किया जा सका कि उसी हथियार से हत्या हुई थी।

वैवाहिक विवाद को हत्या का कारण मानने से इनकार

मृतका के माता-पिता द्वारा पति-पत्नी के बीच तनाव की बात कही गई थी। हालांकि हाईकोर्ट ने इसे हत्या का पुख्ता कारण मानने से इनकार कर दिया। कोर्ट का कहना था कि केवल वैवाहिक तनाव के आधार पर हत्या का आरोप साबित नहीं किया जा सकता।  हाईकोर्ट ने दोनों आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। चूंकि दोनों आरोपी पहले से जमानत पर थे, इसलिए अदालत ने उन्हें जमानत बंधन से भी मुक्त कर दिया।

कानूनी दृष्टि से फैसले का महत्व

यह फैसला इस बात को दर्शाता है कि किसी भी आपराधिक मामले में दोष सिद्ध करने के लिए मजबूत और पुख्ता सबूत जरूरी होते हैं। केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्य या अनुमान के आधार पर किसी को सजा नहीं दी जा सकती। झारखंड हाईकोर्ट के इस फैसले से यह साफ हो गया है कि न्यायालय सबूतों के आधार पर ही फैसला देता है। यदि जांच में कमी या सबूतों की कमजोरी सामने आती है, तो आरोपी को संदेह का लाभ दिया जा सकता है।

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एयर नाऊ स्पेशल

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