Jharkhand : झारखंड की जमीन के नीचे कोयला है, लौह अयस्क है, बॉक्साइट है, चूना पत्थर है और यूरेनियम भी है. देश की फैक्ट्रियों से लेकर बिजलीघरों तक इन खनिजों की जरूरत पड़ती है. लेकिन अब सवाल सिर्फ इस बात का नहीं है कि झारखंड की जमीन से कितना खनिज निकलता है. सवाल ये है कि उस खनिज से मिलने वाले राजस्व पर अधिकार किसका होगा.
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इसी मुद्दे को लेकर झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा और तेज कर दिया है. सोरेन ने लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को चिट्ठी लिखकर खान और खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 के प्रावधानों पर समर्थन और हस्तक्षेप की मांग की है.
हेमंत सोरेन का कहना है कि मामला सिर्फ झारखंड को मिलने वाले पैसे का नहीं है. इसके पीछे राज्यों की वित्तीय और विधायी शक्तियां और देश का संघीय ढांचा भी जुड़ा हुआ है.
अब समझिए विवाद की शुरुआत कहां से हो रही है.
सोरेन ने प्रस्तावित धारा 9D पर खास तौर पर आपत्ति जताई है. उनका कहना है कि इस प्रावधान से खनिज वाली जमीन पर राज्यों के टैक्स, सेस और दूसरी लेवी लगाने के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं. यानी जिस जमीन के नीचे खनिज है, वहां से राज्य सरकार को मिलने वाले राजस्व के अधिकार पर इसका सीधा असर पड़ सकता है.
मुख्यमंत्री ने अपनी चिट्ठी में सुप्रीम कोर्ट के एक अहम फैसले का भी हवाला दिया है. उन्होंने नौ सदस्यीय संविधान पीठ के Mineral Area Development Authority बनाम Steel Authority of India Ltd. मामले का जिक्र करते हुए कहा कि अदालत ने राज्यों की ओर से खनिज वाली जमीन पर टैक्स लगाने की शक्ति को मान्यता दी थी.
इसी संवैधानिक अधिकार के आधार पर झारखंड विधानसभा ने Jharkhand Mineral Bearing Land Cess Act, 2024 भी पारित किया था. लेकिन हेमंत सोरेन का आरोप है कि केंद्र सरकार का प्रस्तावित संशोधन राज्यों को मिली इसी शक्ति को सीमित करने की दिशा में बढ़ रहा है.
और यहीं से मामला राजनीतिक भी हो जाता है.
हेमंत सोरेन ने राहुल गांधी से कहा है कि वह इस मुद्दे को संसद और राष्ट्रीय राजनीति में मजबूती से उठाएं. सोरेन ने राहुल गांधी के संवैधानिक अधिकारों, राज्यों की स्वायत्तता और सहकारी संघवाद को लेकर दिए गए बयानों का हवाला देते हुए उनसे झारखंड के इस मुद्दे पर समर्थन मांगा है.
हालांकि सोरेन का कहना है कि उन्होंने इस मामले को राहुल गांधी तक पहुंचाने से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने भी उठाया था. मुख्यमंत्री ने केंद्र से प्रस्तावित बदलावों पर दोबारा विचार करने की मांग की थी. लेकिन संसद के दोनों सदनों से विधेयक पारित होने के बाद उन्होंने राष्ट्रपति के सामने भी अपनी आपत्तियां दर्ज कराई हैं.
झारखंड इस मुद्दे को इतना बड़ा क्यों मान रहा है?
झारखंड की अर्थव्यवस्था और यहां की राजनीति में खनिजों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है. राज्य लंबे समय से देश के औद्योगिक विकास में कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट, चूना पत्थर और यूरेनियम जैसे खनिजों के जरिए बड़ा योगदान देता रहा है.
लेकिन खनन के साथ इसकी दूसरी तस्वीर भी है
खनिज निकालने वाले इलाकों में विस्थापन, रोजगार का संकट, पारंपरिक आजीविका का नुकसान और स्थानीय आबादी की दूसरी परेशानियां लंबे समय से राजनीतिक मुद्दा रही हैं. हेमंत सोरेन इसी तस्वीर को सामने रखते हुए कह रहे हैं कि खनिज संपदा से मिलने वाला राजस्व सिर्फ सरकारी खाते का आंकड़ा नहीं है. इसका इस्तेमाल राज्य के विकास और खनन प्रभावित लोगों के हित में होना चाहिए.
यानी लड़ाई जमीन के नीचे मौजूद खनिजों की है, लेकिन असली सवाल जमीन के ऊपर मौजूद सत्ता के अधिकारों का है.
एक तरफ केंद्र सरकार का प्रस्तावित संशोधन है. दूसरी तरफ झारखंड सरकार अपने संवैधानिक और वित्तीय अधिकारों की बात कर रही है. और अब इस लड़ाई में राहुल गांधी से समर्थन मांगकर हेमंत सोरेन ने इसे संसद और राष्ट्रीय राजनीति के पटल पर ले जाने की कोशिश की है.
आने वाले दिनों में यह मुद्दा सिर्फ झारखंड बनाम केंद्र की बहस तक सीमित रहता है या राज्यों के अधिकार और संघीय ढांचे पर बड़ी राजनीतिक बहस बनता है, इस पर सबकी नजर रहेगी.

