Saturday, September 12, 2026

रांची में छह साल से मानदेय का इंतजार, श्रमिक मित्रों का फूटा गुस्सा, अब आंदोलन की चेतावनी

झारखंड में सरकारी योजनाओं को मजदूरों तक पहुंचाने वाले श्रमिक मित्रों का सब्र अब आंदोलन की ओर बढ़ता दिख रहा है। रांची में श्रमिक मित्रों ने लंबे समय से लंबित मानदेय के भुगतान की मांग को लेकर सरकार के खिलाफ आंदोलन की चेतावनी दी है। उनका कहना है कि वे करीब छह साल से अपने मानदेय का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन बार-बार मांग उठाने के बावजूद भुगतान नहीं किया गया। अब श्रमिक मित्र संघ ने साफ कर दिया है कि अगर जल्द बकाया राशि का भुगतान नहीं हुआ, तो सड़क पर उतरकर आंदोलन किया जाएगा।

मामला झारखंड के भवन एवं अन्य सन्निर्माण कर्मकार कल्याण बोर्ड यानी BOCW से जुड़ा है। मजदूरों को सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने और श्रम विभाग से जुड़ी सुविधाओं तक उनकी पहुंच आसान बनाने के लिए साल 2016 में प्रखंड स्तर पर श्रमिक मित्रों का चयन किया गया था। चयन के बाद उन्हें नियुक्ति पत्र भी दिया गया। इसके बाद से श्रमिक मित्र लगातार अलग-अलग इलाकों में जाकर मजदूरों के लिए काम करते रहे हैं।

अब इन श्रमिक मित्रों का कहना है कि जिस काम के लिए उन्हें जिम्मेदारी दी गई, उसे उन्होंने लगातार निभाया, लेकिन उसके बदले मिलने वाला मानदेय वर्षों से अटका हुआ है। यानी काम चलता रहा, जिम्मेदारी निभती रही, लेकिन भुगतान का इंतजार खत्म नहीं हुआ।

गांव-गांव जाकर मजदूरों तक पहुंचाते हैं सरकारी योजनाएं

श्रमिक मित्रों का काम सिर्फ कागजी प्रक्रिया तक सीमित नहीं है। वे गांवों और दूरदराज के इलाकों में जाकर मजदूरों का श्रम विभाग में निबंधन कराने में मदद करते हैं। इसके साथ ही उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने के लिए भी काम करते हैं।

श्रमिक मित्रों का दावा है कि कई ऐसे इलाके हैं जहां सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों का पहुंचना आसान नहीं होता। ऐसे इलाकों में वे मजदूरों और सरकारी व्यवस्था के बीच कड़ी का काम करते हैं। मजदूरों को योजनाओं की जानकारी देने से लेकर उनके निबंधन और लाभ दिलाने तक की प्रक्रिया में श्रमिक मित्रों की भूमिका रहती है।

उनके मुताबिक पहले एक मजदूर का निबंधन कराने पर 10 रुपये और किसी योजना का लाभ दिलाने पर 10 रुपये मानदेय दिया जाता था। रकम भले ही छोटी लगे, लेकिन बड़ी संख्या में मजदूरों तक पहुंचने और लगातार काम करने के बाद यही मानदेय उनकी आय का हिस्सा बनता था।

श्रमिक मित्रों ने श्रम शक्ति अभियान, सरकार आपके द्वार और कोरोना काल के दौरान जिला विधिक सेवा प्राधिकार यानी DLSA से जुड़े कामों में भी अपनी सेवाएं देने की बात कही है। उनका कहना है कि अलग-अलग सरकारी अभियानों में जिम्मेदारी मिलने के बावजूद उनके बकाया भुगतान का मामला अब तक नहीं सुलझा है।

छह साल से भुगतान नहीं, परिवार चलाना मुश्किल

सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इतने लंबे समय से मानदेय क्यों नहीं मिला? श्रमिक मित्रों का आरोप है कि करीब छह साल से उनके काम का भुगतान लंबित है। लगातार काम करने के बावजूद जब मेहनताना नहीं मिलता, तो इसका सीधा असर परिवार की आर्थिक स्थिति पर पड़ता है।

श्रमिक मित्रों का कहना है कि लंबे समय तक भुगतान नहीं होने की वजह से उनके सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। कई लोगों के लिए परिवार का रोजमर्रा का खर्च चलाना तक मुश्किल हो रहा है। ऐसे में अब उनकी नाराजगी सिर्फ मानदेय मिलने तक सीमित नहीं है, बल्कि वे सरकार से यह भी मांग कर रहे हैं कि आगे नियमित रूप से मानदेय भुगतान की व्यवस्था की जाए।

यानी सवाल सिर्फ पुराने बकाये का नहीं है। सवाल ये भी है कि अगर श्रमिक मित्र लगातार सरकारी योजनाओं को जमीन पर पहुंचाने का काम कर रहे हैं, तो उनके भुगतान की व्यवस्था नियमित क्यों नहीं हो पा रही है?

हाईकोर्ट के आदेश का भी दिया हवाला

श्रमिक मित्रों ने अपने पक्ष में हाईकोर्ट के एक आदेश का भी हवाला दिया है। उनका कहना है कि हाईकोर्ट ने बकाया मानदेय का भुगतान छह महीने के अंदर करने का आदेश दिया था। इसके बावजूद अभी तक उन्हें उनका लंबित मानदेय नहीं मिला है।

यही वजह है कि श्रमिक मित्रों में नाराजगी और बढ़ गई है। उनका सवाल है कि जब न्यायालय की ओर से भुगतान को लेकर आदेश दिया जा चुका है, तो फिर जमीन पर उसका असर क्यों नहीं दिख रहा?

हालांकि हाईकोर्ट के आदेश और उसके अनुपालन से जुड़े दावों की पूरी कानूनी स्थिति संबंधित दस्तावेजों और आधिकारिक रिकॉर्ड से स्पष्ट होगी। फिलहाल श्रमिक मित्र संघ का कहना है कि उन्हें अपने बकाये का इंतजार अब और नहीं करना है।

पहले धरना, फिर भूख हड़ताल

श्रमिक मित्र संघ ने आंदोलन का रोडमैप भी साफ कर दिया है। अगर जल्द उनकी मांग पूरी नहीं हुई तो सबसे पहले धरना-प्रदर्शन किया जाएगा। इसके बाद भी अगर सरकार की तरफ से कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा।

संघ ने भूख हड़ताल और अनशन की चेतावनी भी दी है। श्रमिक मित्रों का कहना है कि वे लंबे समय से अपनी मांग सरकार और विभाग के सामने रखते रहे हैं, लेकिन अब उन्हें आंदोलन का रास्ता अपनाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।

उनकी मुख्य मांग है कि वर्षों से लंबित मानदेय का जल्द से जल्द भुगतान किया जाए। साथ ही भविष्य में हर महीने मानदेय मिलने की नियमित व्यवस्था बनाई जाए, ताकि श्रमिक मित्रों को दोबारा इसी तरह लंबे इंतजार का सामना न करना पड़े।

सरकार के सामने अब क्या चुनौती?

झारखंड में सरकारी योजनाओं को आखिरी व्यक्ति तक पहुंचाने की बात अक्सर होती है। लेकिन उन योजनाओं को गांव-गांव तक पहुंचाने वाले लोगों की स्थिति क्या है, श्रमिक मित्रों का मामला इसी सवाल को सामने ला रहा है।

अगर श्रमिक मित्रों का दावा सही है और लंबे समय से उनका मानदेय लंबित है, तो सरकार और श्रम विभाग के सामने इस मामले को जल्द सुलझाने की चुनौती है। क्योंकि एक तरफ मजदूरों तक सरकारी योजनाओं को पहुंचाने की जिम्मेदारी है और दूसरी तरफ उन लोगों के भुगतान का सवाल है, जो इस काम को जमीन पर लागू करने में मदद कर रहे हैं।

फिलहाल श्रमिक मित्रों ने अपना रुख साफ कर दिया है। छह साल का इंतजार अब आंदोलन में बदल सकता है। पहले धरना होगा, फिर जरूरत पड़ी तो भूख हड़ताल और अनशन का रास्ता अपनाया जाएगा। अब देखना होगा कि सरकार और श्रम विभाग इस चेतावनी के बाद क्या कदम उठाते हैं और क्या वर्षों से लंबित मानदेय का भुगतान श्रमिक मित्रों तक पहुंच पाता है।

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एयर नाऊ स्पेशल

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