Tuesday, October 6, 2026

यूपी के मुगलसराय से प्रधानमंत्री की कुर्सी तक, ऐसा रहा लाल बहादुर शास्त्री का सफर

डेस्क: हर साल 2 अक्टूबर को देश महात्मा गांधी की जयंती के साथ-साथ भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की जयंती भी मनाई जाती है। शास्त्री जी का जीवन सादगी, ईमानदारी, मेहनत और देश के प्रति समर्पण का उदाहरण रहा है। छोटे से शहर से निकलकर देश के प्रधानमंत्री बनने तक का उनका सफर आज भी लोगों को काफी प्रेरणा देता है।

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2 अक्टूबर 1904 को हुआ था जन्म

लाल बहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर 1904 को उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में हुआ था। उनके पिता एक स्कूल शिक्षक थे और जा वे सिर्फ डेढ़ साल के थे, तभी उनके पिता का निधन हो गया था। जिसके बाद उनकी मां ने बच्चों की परवरिश की। आर्थिक परेशानियों के बावजूद शास्त्री जी ने पढ़ाई जारी रखी और आगे चलकर काशी विद्यापीठ से शिक्षा प्राप्त की। यहीं से उन्हें ‘शास्त्री’ की उपाधि मिली, जो बाद में उनके नाम का हिस्सा बन गई।

छोटी उम्र में आजादी की लड़ाई से जुड़े

महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित होकर शास्त्री जी कम उम्र में ही स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए थे। 16 साल की उम्र में उन्होंने गांधी जी के असहयोग आंदोलन के आह्वान पर अपनी पढ़ाई छोड़ने का फैसला किया। बाद में उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रूप से हिस्सा लिया और ब्रिटिश शासन के दौरान करीब सात साल जेल में रहे।

आजादी के बाद संभाली कई बड़ी जिम्मेदारियां

आजादी के बाद शास्त्री जी ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में काम किया और बाद में केंद्र सरकार में कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाली। वे रेल मंत्री यानी Railway Minister, परिवहन एवं संचार मंत्री यानी Minister of Transport and Communication, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री Commerce and Industry Minister और गृह मंत्री Home Minister रहे। रेल मंत्री रहते हुए एक बड़ी रेल दुर्घटना के बाद उन्होंने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे दिया था।

देश के दूसरे प्रधानमंत्री

पंडित जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद 9 जून 1964 को लाल बहादुर शास्त्री ने भारत के प्रधानमंत्री का पद संभाला। उनका कार्यकाल भले ही छोटा रहा, लेकिन इस दौरान देश को कई महत्वपूर्ण चुनौतियों का सामना करना पड़ा। 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय उन्होंने देश का नेतृत्व किया।

इसी दौर में उनका दिया नारा ‘जय जवान, जय किसान’ पूरे देश में लोकप्रिय हुआ। इस नारे के जरिए उन्होंने देश की सुरक्षा में जवानों और देश की खाद्य जरूरतों को पूरा करने वाले किसानों, दोनों के महत्व को सामने रखा।

ताशकंद में हुआ निधन

भारत और पाकिस्तान के बीच 1965 के युद्ध के बाद शांति के लिए ताशकंद में समझौता हुआ। 10 जनवरी 1966 को शास्त्री जी और पाकिस्तान के राष्ट्रपति मोहम्मद अयूब खान ने ताशकंद घोषणा पर हस्ताक्षर किए थे। इसके अगले दिन 11 जनवरी 1966 को ताशकंद में उनका निधन हो गया। वे उस समय भारत के प्रधानमंत्री थे।

लाल बहादुर शास्त्री का जीवन बताता है कि बड़ा पद मिलने के बाद भी सादगी, ईमानदारी और जिम्मेदारी को अपने जीवन का हिस्सा बनाया जा सकता है। यही वजह है कि हर साल 2 अक्टूबर को देश उन्हें सम्मान के साथ याद करता है।

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एयर नाऊ स्पेशल

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