झारखंड से आज देर रात एक दुखद खबर सामने आई। Rupi Soren का निधन हो गया। रांची के हिलव्यू अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली। किसी के लिए वह दिशोम गुरु शिबू सोरेन की पत्नी थीं और किसी के लिए झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मां। लेकिन यह सिर्फ रिश्तों से बनी पहचान है। उनकी पूरी जिंदगी इससे कहीं बड़ी थी।
Highlights:
जब शिबू सोरेन झारखंड के जंगलों में आंदोलन की जमीन तैयार कर रहे थे, तब घर की जिम्मेदारी Rupi Soren संभाल रही थीं। गुरुजी जेल में गए तो उन्हें छुड़ाने के लिए वह अपने मायके पहुंचीं। शिबू सोरेन फरारी में रहे तो महीनों उनके लौटने का इंतजार किया। महाजन खेत पर कब्जा करने पहुंचा तो उसके सामने हसुआ लेकर खड़ी हो गईं। और जब कई दिनों तक गुरुजी की कोई खबर नहीं मिली तो गोद में बच्चा लेकर जंगल और पहाड़ों में उन्हें खोजने निकल पड़ीं।
चांडिल से शुरू हुई Rupi Soren की कहानी
Rupi Soren की कहानी समझने के लिए शुरुआत चांडिल से करनी होगी। करीब छह दशक पहले दुर्गा पूजा के दौरान शिबू सोरेन उनके मायके पहुंचे थे। वहां एक राजपूत परिवार से उनका परिचय था। परिवार के एक बुजुर्ग ने शादी का प्रस्ताव रखा। हालांकि शिबू सोरेन ने कहा कि उनके बड़े भाई की अभी शादी नहीं हुई है। पहले बड़े भाई की शादी हुई और फिर कुछ साल बाद रूपी और शिबू सोरेन की शादी हुई।
शादी के बाद रूपी ने नेमरा में घर संभाला। इसी दौरान शिबू सोरेन का सार्वजनिक जीवन तेजी से बदल रहा था। आंदोलन बढ़ रहा था और उसके साथ पुलिस की कार्रवाई भी।
हजारीबाग जेल से पति को निकालने की कोशिश
शादी के कुछ ही समय बाद शिबू सोरेन गिरफ्तार कर लिए गए और हजारीबाग जेल भेज दिए गए। नेमरा के घर में रूपी अकेली थीं। नई शादी थी। बच्चे नहीं थे और आर्थिक स्थिति भी मजबूत नहीं थी।
सवाल था कि जेल से पति को बाहर कैसे निकाला जाए।
Rupi Soren ने गांव के एक व्यक्ति से मदद मांगी। उनसे कहा कि या तो कुछ पैसे उधार दे दीजिए या चांडिल जाने का टिकट कटवा दीजिए। इसके बाद वह अपने मायके पहुंचीं और पिता को बताया कि दामाद हजारीबाग जेल में हैं। परिवार ने इंतजाम किया और फिर शिबू सोरेन को जेल से बाहर निकालकर नेमरा लाया गया। जेल से लौटने के बाद उनकी हालत खराब थी और घर पर उनकी देखभाल हुई।
लेकिन यह पुलिस और जेल से जुड़ा आखिरी मामला नहीं था। आने वाले वर्षों में यही परिस्थितियां परिवार की जिंदगी का हिस्सा बन गईं।
एक तरफ आंदोलन, दूसरी तरफ घर
शिबू सोरेन आंदोलन में सक्रिय होते गए और उनका घर से बाहर रहना बढ़ता गया। कभी जंगलों में, कभी पहाड़ों में और कभी किसी गांव में बैठक। पुलिस उन्हें तलाश रही थी।
इधर नेमरा में रूपी के सामने घर की जिम्मेदारी थी। कभी वह खुद नेमरा में रहतीं तो कभी बच्चों को लेकर चांडिल मायके चली जातीं।
खेत कौन देखेगा? बच्चों को कौन संभालेगा? और पुलिस घर पहुंच गई तो क्या होगा? ऐसे सवाल रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके थे।
महाजन खेत जोतने आया तो हसुआ लेकर सामने खड़ी हो गईं
इसी दौर में एक दिन नेमरा में बिष्टु साव नाम का महाजन कुछ लोगों के साथ पहुंचा और खेत जोतने लगा। रूपी ने उसे रोकने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं माना।
तब रूपी ने धान काटने वाला हसुआ उठा लिया और उसके पीछे दौड़ पड़ीं। महाजन भागा और इसी दौरान उसका कपड़ा फट गया। रूपी ने उसे पकड़ लिया और अपनी ननद को आवाज दी। दोनों ने मिलकर उसका सामना किया।
इसके बाद उस महाजन ने दोबारा उस जमीन पर हल चलाने की कोशिश नहीं की।
यह घटना उस दौर की तस्वीर भी दिखाती है, जब जमीन का विवाद सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं था। गांवों में जमीन पर कब्जे को लेकर सीधे टकराव होते थे और नेमरा में रूपी खुद अपने परिवार की जमीन के सामने खड़ी थीं।
फरारी में शिबू सोरेन और जंगलों में तलाश
इसके बाद शिबू सोरेन फरारी में रहने लगे। घर आना भी जोखिम भरा था। कभी वेश बदलकर आते तो कभी किसी साथी के जरिए घर का हालचाल लेते। कई बार कई दिनों तक कोई खबर नहीं मिलती।
टुंडी के आसपास के जंगल और पहाड़ उनके ठिकानों में शामिल थे।
एक बार लंबे समय तक शिबू सोरेन की कोई खबर नहीं मिली तो Rupi Soren ने इंतजार करने के बजाय उन्हें खोजने का फैसला किया। वह अपनी ननद और सास के साथ जंगल की ओर निकल पड़ीं। गोद में बच्चा था और सामने जंगल और पहाड़।
उन्हें ठीक से पता नहीं था कि गुरुजी कहां मिलेंगे। बस तलाश करनी थी।
पुलिस की पूछताछ पर रूपी का जवाब
इसी दौर में नेमरा में पुलिस की पूछताछ भी बढ़ती रही। पुलिस आती, सवाल करती और परिवार से शिबू सोरेन के बारे में जानकारी लेने की कोशिश करती।
एक बार लगातार पूछताछ से परेशान होकर रूपी ने पुलिस वालों से साफ कह दिया था कि यह शिबू सोरेन का घर नहीं है, रूपी सोरेन का घर है। शिबू सोरेन जहां होंगे, वहां जाकर उन्हें खोजिए।
उधर आंदोलन का दायरा बढ़ रहा था। लोगों और कार्यकर्ताओं का घर आना जाना बढ़ गया था। मुश्किल वक्त में ज्ञानरंजन, साइमन मरांडी और धान सिंह मुंडारी जैसे लोग परिवार के साथ खड़े रहे।
रूपी खुद राजनीति में सक्रिय नहीं थीं, लेकिन आंदोलन का असर उनके घर की रोजमर्रा की जिंदगी में लगातार दिखाई देता रहा।
झारखंड बना तो Rupi Soren ने कहा, सपना पूरा हुआ
साल बीतते गए। आंदोलन आगे बढ़ा। बच्चे बड़े हुए। आखिरकार 15 नवंबर 2000 को झारखंड अलग राज्य बना।
जब Rupi Soren से पूछा गया कि झारखंड बनने पर कैसा लगा तो उनका जवाब था, बहुत अच्छा लगा। सपना पूरा हुआ।यह जवाब छोटा था, लेकिन इसके पीछे उन वर्षों का अनुभव था, जिसमें घर ने आंदोलन का दबाव, पुलिस की पूछताछ, जमीन के विवाद और लंबे इंतजार देखे थे।
चुनाव भी लड़ा, लेकिन राजनीति में लंबी पारी नहीं
राज्य बनने के बाद भी रूपी की कहानी पूरी तरह राजनीति से अलग नहीं हुई। 1999 में उन्होंने एकीकृत बिहार की दुमका लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा। उनके सामने बाबूलाल मरांडी थे। मुकाबला करीबी रहा और रूपी चुनाव हार गईं।
बाद में उन्होंने खरसावां विधानसभा सीट से अर्जुन मुंडा के खिलाफ चुनाव लड़ने की इच्छा भी जताई। उनका आरोप था कि अर्जुन मुंडा मुख्यमंत्री रहते हुए राज्य के लोगों के साथ न्याय नहीं कर पाए। हालांकि यह चुनाव नहीं हुआ।
इसके बाद उनकी सार्वजनिक राजनीतिक भूमिका सीमित होती गई।
परिवार की अगली पीढ़ी सत्ता के केंद्र में पहुंची
समय के साथ परिवार की अगली पीढ़ी राजनीति में आगे बढ़ी। हेमंत सोरेन सक्रिय राजनीति में आए और आगे चलकर झारखंड के मुख्यमंत्री बने।
जिस घर में कभी पुलिस पहुंचती थी और जहां शिबू सोरेन के लौटने का इंतजार होता था, उसी परिवार के सदस्य अब झारखंड की सत्ता के केंद्र में थे।
हेमंत किसी बड़े राजनीतिक पड़ाव पर पहुंचते तो माता पिता से मिलते। चुनाव अभियान हो, पार्टी का कार्यक्रम हो या मुख्यमंत्री पद की शपथ, परिवार के इस निजी हिस्से में Rupi Soren की मौजूदगी बनी रही।
घर में शिबू सोरेन की अलग तस्वीर
उम्र बढ़ने के साथ शिबू सोरेन की सेहत कमजोर हुई तो रूपी उनकी देखभाल करती रहीं। बाहर की दुनिया के लिए शिबू सोरेन आंदोलनकारी और बड़े राजनीतिक नेता थे, लेकिन घर में उनकी एक दूसरी तस्वीर थी।
Rupi Soren बताती थीं कि उन्हें खेती बाड़ी पसंद थी। पेड़ पौधों और पशु पक्षियों के बीच रहना अच्छा लगता था। सादा खाना पसंद था। पुराने रिश्ते निभाते थे और किसी पुराने परिचित को मुश्किल में देखते तो मदद करते थे।
यानी सार्वजनिक जीवन के शिबू सोरेन और घर के शिबू सोरेन के बीच का फर्क सबसे करीब से रूपी ने देखा था।
रिश्तों से आगे थी Rupi Soren की पहचान
Rupi Soren की जिंदगी बड़े राजनीतिक भाषणों से ज्यादा घटनाओं से बनी थी। हजारीबाग जेल से पति को बाहर निकालने की कोशिश, नेमरा के खेत में महाजन का सामना, जंगलों में शिबू सोरेन की तलाश, पुलिस की पूछताछ और बच्चों की परवरिश, ये सभी उनकी जिंदगी का हिस्सा रहे।
झारखंड आंदोलन के इतिहास में ये घटनाएं शायद फुटनोट की तरह दिखाई दें, लेकिन रूपी सोरेन की जिंदगी इन्हीं घटनाओं से बनी थी।
इसलिए उन्हें सिर्फ शिबू सोरेन की पत्नी या हेमंत सोरेन की मां के तौर पर देखना उनकी कहानी को अधूरा कर देता है। जब शिबू सोरेन बाहर आंदोलन कर रहे थे, तब नेमरा के घर के भीतर भी एक अलग मोर्चा चल रहा था। उस मोर्चे पर रूपी सोरेन थीं।


