
राँची: झारखंड हाईकोर्ट ने रांची के सुखदेवनगर अतिक्रमण हटाओ अभियान के दौरान हुई कार्रवाई पर कड़ी नाराजगी जताई है। महादेव उरांव द्वारा दायर अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े किए। कोर्ट ने हेहल के अंचल अधिकारी (CO) से सीधा सवाल किया कि आदेश जमीन से कब्जा हटाने का था, तो फिर वहां बने निर्माण को ध्वस्त क्यों किया गया?
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CO की दलील: तीन बार दिया था नोटिस
सुनवाई के दौरान हेहल के सर्किल ऑफिसर (CO) की ओर से अदालत में शो-कॉज (कारण बताओ नोटिस) दाखिल किया गया। उन्होंने अपनी सफाई में कहा कि अतिक्रमण करने वालों (हस्तक्षेपकर्ताओं) को विभाग की ओर से तीन बार नोटिस जारी किए गए थे। नोटिस के बावजूद संबंधित पक्षों ने जमीन से जुड़े जरूरी दस्तावेज पेश नहीं किए। दस्तावेजों के अभाव में प्रशासन ने नियमानुसार निर्माण को ध्वस्त करने की कार्रवाई शुरू की।
कोर्ट का प्रार्थी को भी लगाई फटकार
इस मामले में केवल प्रशासन ही नहीं, बल्कि याचिकाकर्ता (प्रार्थी) भी कोर्ट के निशाने पर रहे। अदालत ने प्रार्थी से पूछा कि जब उन्होंने पूर्व में हस्तक्षेपकर्ताओं के साथ एग्रीमेंट किया था और पैसे लिए थे, तो रिट याचिका दाखिल करते समय यह जानकारी कोर्ट से क्यों छिपाई गई? अदालत ने प्रार्थी को इस पर स्पष्ट जवाब देने का निर्देश दिया है।
पीड़ितों की अंतरिम सुरक्षा बरकरार
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने हस्तक्षेपकर्ताओं की याचिका को स्वीकार कर लिया है और उन्हें मामले में प्रतिवादी बना लिया है। कोर्ट ने पीड़ितों को राहत देते हुए स्पष्ट किया कि उनके खिलाफ दी गई अंतरिम राहत अगले आदेश तक जारी रहेगी। फिलहाल उनके खिलाफ किसी भी प्रकार की दंडात्मक या ध्वस्तीकरण की कार्रवाई नहीं की जाएगी।
अगली सुनवाई पर टिकी हैं निगाहें
सुखदेवनगर के इस विवादित अतिक्रमण मामले की अगली सुनवाई अब 8 मई को निर्धारित की गई है। हस्तक्षेपकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता गौरव राज ने मजबूती से पक्ष रखा। कोर्ट के इस सख्त रुख के बाद अब प्रशासन को यह साबित करना होगा कि उनकी कार्रवाई कानूनी दायरे के भीतर थी या नहीं।
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